भोपाल। मप्र में सहकारिता विभाग के नियम और गेहूं खरीदी की तारीखों के बीच सामंजस्य न होने का खामियाजा प्रदेश के किसानों को भारी ब्याज चुकाकर भुगतना पड़ रहा है। तकनीकी खामियों और प्रशासनिक लेटलतीफी के कारण जो किसान ईमानदारी से कर्ज चुकाना चाहते हैं, वे भी अब व्यवस्था के आगे बेबस नजर आ रहे हैं।
भोपाल के बैरसिया तहसील के ललोई गांव से आए किसान ओमप्रकाश शर्मा की आपबीती इस अव्यवस्था का जीवंत उदाहरण है। कांग्रेस सेवादल के सत्याग्रह में शामिल होने पहुंचे किसान ओमप्रकाश शर्मा ने बताया कि उन्होंने ललोई सहकारी समिति से 2 लाख रुपये का केसीसी (KCC) ऋण लिया था। रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें कुल 2 लाख 5 हजार रुपये चुकाने थे, जिसमें से 5 हजार रुपये पहले से ही सोसाइटी में जमा थे।
उन्होंने 2 मार्च को 2 लाख 300 रुपये का चेक जमा किया, जो 24 मार्च को क्लियर भी हो गया। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि महज 5 हजार रुपये का वाउचर न भर पाने की तकनीकी चूक के कारण सोसाइटी ने उन पर 12,194 रुपये का ब्याज थोप दिया। किसान का आरोप है कि मात्र 15 दिनों के भीतर इतना भारी ब्याज वसूलना सरासर लूट है।
किसानों की सबसे बड़ी समस्या सरकार की विरोधाभासी नीतियां हैं। एक ओर सरकार ने गेहूं खरीदी की शुरुआत 9 अप्रैल से की, वहीं दूसरी ओर कर्ज चुकाने की अंतिम तिथि 31 मार्च तय कर दी। किसान ओमप्रकाश का कहना है, “हमारे पास आय का एकमात्र साधन खेती है। जब तक फसल तुल नहीं जाती, हम पैसा कहां से लाएं? मजबूरी में किसानों ने दूसरों से कर्ज लेकर बैंक का लोन भरा है।
