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मणिपुर में जारी हिंसा के बीच कुछ इलाकों में फिर से लगा AFSPA, पूर्वोत्तर में क्यों होता है इस कानून का विरोध?

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नई दिल्ली

मणिपुर में एक बार फिर हुई हिंसा की ताजा घटनाओं के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरुवार को हिंसा प्रभावित जिरीबाम सहित मणिपुर के छह पुलिस थाना क्षेत्रों में Armed Forces Special Powers Act (AFSPA), 1958 को फिर से लागू कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि इस इलाके में जारी जातीय हिंसा और लगातार संवेदनशील स्थिति के मद्देनजर यह फैसला लिया गया है। इससे पहले सितंबर, 2023 में भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 6 महीने के AFSPA कानून को बढ़ा दिया था।

बीते सोमवार को ही सुरक्षा बलों ने हमार समुदाय के 10 संदिग्ध उग्रवादियों को मार गिराया था। इसके बाद जिरीबाम में मैतेई समुदाय के दो लोगों के शव बरामद किए गए थे और कुछ लोग अभी भी लापता हैं। इससे पता चलता है कि मणिपुर अभी भी अशांत है और इसे देखते हुए ही केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह फैसला लिया है। केंद्र ने बीते दिन ही सीआरपीएफ की 20 अतिरिक्त कंपनियां भी मणिपुर भेजी हैं।

मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा
मणिपुर में मई, 2023 में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा शुरू हुई थी और राज्य और केंद्र सरकार की पूरी कोशिश के बाद भी वहां से लगातार हिंसा की खबरें आ रही हैं। इस हिंसा में अब तक हजारों लोग बेघर हो चुके हैं, सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और संपत्ति का भी अच्छा-खासा नुकसान हो चुका है। इसे लेकर मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को बदलने की मांग भी बीजेपी के भीतर लगातार उठती रही है हालांकि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अभी तक एन. बीरेन सिंह को नहीं हटाया है। विपक्ष लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगता है कि वह तमाम चुनावी राज्यों के दौरे करते हैं, विदेश जाते हैं लेकिन हिंसा प्रभावित मणिपुर नहीं जाते।

AFSPA कानून को हटाने की मांग
आईए अब समझते हैं कि AFSPA कानून क्या है और पूर्वोत्तर के राज्य हमेशा इसके खिलाफ क्यों रहे हैं? इससे पहले याद दिलाना होगा कि दिसंबर 2021 में नागालैंड की कैबिनेट ने सिफारिश की थी कि उनके राज्य से AFSPA कानून को निरस्त कर दिया जाए। तब राज्य के मोन जिले में हुई एक बड़ी घटना में सुरक्षा बलों ने 13 लोगों को गोली मार दी थी। पूर्वोत्तर के राज्यों की यह लंबे वक्त से मांग रही है कि उनके राज्य से AFSPA कानून को खत्म कर दिया जाए। मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने भी इस कानून को हटाए जाने की मांग की थी।किसी भी क्षेत्र में AFSPA कानून को लागू करने का मतलब है कि उस क्षेत्र को “डिस्टबर्ड एरिया” या अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया गया है।

ब्रिटिश सरकार ने किया था लागू
AFSPA कानून ब्रिटिश सरकार द्वारा 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के जवाब में लागू किया गया था। आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस कानून को जारी रखने का फैसला किया था और 1958 में इसे कानून के रूप में लागू कर दिया गया।

पूर्वोत्तर के राज्यों, जम्मू कश्मीर और पंजाब में जब उग्रवाद चरम पर था तब इन राज्यों में इस कानून को लागू किया गया था। इसके बाद पंजाब पहला ऐसा राज्य था जहां से इसे हटाया गया। उसके बाद पूर्वोत्तर के राज्यों त्रिपुरा और मेघालय से भी इसे हटा दिया गया लेकिन नागालैंड, मणिपुर, असम तथा अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में अभी भी यह कानून लागू है।

यह कानून आर्म्ड फोर्सेज यानी सशस्त्र बलों को कुछ विशेष ताकत देता है और इसे केंद्र सरकार द्वारा या उस राज्य के राज्यपाल के द्वारा ही लागू किया जा सकता है लेकिन उससे पहले उस इलाके को इस कानून की धारा 3 के मुताबिक डिस्टर्ब या अशांत क्षेत्र घोषित करना होता है। यह कानून कहता है कि डिस्टर्ब एरिया वह इलाका है जहां पर सशस्त्र बलों की जरूरत है।

AFSPA कानून की क्यों होती है आलोचना?
AFSPA कानून की इसलिए आलोचना की जाती है क्योंकि यह सशस्त्र बलों को बहुत ज्यादा ताकत देता है। इस कानून का उल्लंघन करने वाले या हथियार और गोला-बारूद ले जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ गोली चलाने का अधिकार AFSPA कानून के तहत सशस्त्र बलों को मिलता है। यह कानून सशस्त्र बलों को इस बात का भी अधिकार देता है कि वे बिना किसी वारंट के किसी को सिर्फ इस आधार पर गिरफ्तार कर सकते हैं कि उन्हें उस शख्स पर शक है और वे बिना वारंट के ही किसी भी इलाके की तलाशी ले सकते हैं।

एक्ट कहता है कि इस तरह के ऑपरेशंस में शामिल सुरक्षा बलों के खिलाफ किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति जरूरी होगी।यह कानून सुरक्षा बलों को गोली चलाने का अधिकार तो देता है लेकिन इससे पहले उन्हें उस शख्स को चेतावनी भी देनी होती है। इसके मुताबिक सुरक्षा बलों के द्वारा गिरफ्तार किए जाने वाले किसी शख्स को 24 घंटे के भीतर पुलिस को सौंप दिया जाना चाहिए और सशस्त्र बलों को जिला प्रशासन के साथ सहयोग करके ही काम करना चाहिए।

इरोम शर्मिला ने की थी भूख हड़ताल
साल 2000 में मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने मणिपुर से AFSPA कानून को हटाने के लिए भूख हड़ताल शुरू की थी। वह 16 साल तक भूख हड़ताल पर रही थीं। साल 2004 में यूपीए की तत्कालीन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। जस्टिस रेड्डी आयोग ने 2005 में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि AFSPA कानून उत्पीड़न की पहचान बन गया है और आयोग ने सिफारिश की थी कि इस कानून को हटा दिया जाना चाहिए। इसके बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाले प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी इन सिफारिशों का समर्थन किया था।

 

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