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हिमालयन गिद्ध के बाद अब दिखा सफेद बर्फीला उल्लू, कानपुर में ये हो क्या रहा है!

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कानपुर

उत्तर प्रदेश के कानपुर में उल्लू प्रजाति का बार्न आउल पाया गया है। सफेद उल्लू की यह प्रजाति इस समय चर्चा के केंद्र में बना हुआ है। बार्न आउल विलुप्त और संरक्षित उल्लू की प्रजातियों में से एक है। अमूमन इसे नहीं देखा जाता है। कानपुर के नवीन मार्केट में इसे देखा गया। इसके बाद इसकी जानकारी वन विभाग को दी गई। वन विभाग की टीम ने इसे पकड़ा। इसके बाद इसकी विशेषताएं सामने आई हैं। उल्लू की इस प्रजाति की विशेषताएं चौंकाती हैं। बार्न आउल को उल्लू की प्रजाति में काफी तेज और चालाक माना जाता है। कैद में न रहने वाला यह पक्षी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। पिछले दिनों हिमालयन गिद्ध पाए जाने के बाद अब बार्न आउल के पकड़ में आने से कई प्रकार की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

उल्लू शब्द सुनते ही पेड़ों पर लटके काले रंग के अजीब से दिखने वाले पक्षी के रूप में मानते हैं। दिन में न देख पाने वाले इस पक्षी को लेकर एक अलग प्रकार की सोच सामने आती है। लेकिन, बार्न आउल आपकी सोच को बदल देगा। कानपुर के नवीन मार्केट में पाया गया यह सफेद उल्लू इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है। यह उल्लू कहां से आया, यह किसी को पता नहीं चला। लोगों ने जब उल्लू को एक दुकान पर बैठा देखा तो इसकी चर्चा चारों तरफ होने लगी। सफेद उल्लू को देखने के लिए लोगों की भीड़ बढ़ने लगी। लोगों ने वन विभाग को इसकी सूचना दी। वन विभाग के कर्मचारी मौके पर पहुंचे। उल्लू को पकड़कर चिड़िया घर ले गए।

शिकार पकड़ने में होता है माहिर
बार्न आउल शिकार करने में माहिर होती है। इसे खलिहान उल्लू भी कहते हैं। उल्लू की यह प्रजाति बेहद चालाक और तेज होती है। देश में बार्न आउल अब विलुप्ति के कगार पर है। इसलिए, सरकार इसके संरक्षण की बात कर रही है। खलिहान उल्लू को रात की दुनिया का मूक शिकारी कहा जाता है। दिन के दौरान यह छुपा रहता है या शांत इलाकों में घूमता है। यह सामान्य उल्लुओं से अधिक तेज आवाज निकालता है।

पूरे शिकार को निगलता है बार्न आउल
बार्न उल्लू की सबसेस बड़ी खासियत यह होती है कि वह अपने शिकार को पूरी तरह से निगल जाता है। इसका मुख्य शिकार चूहे होते है। या फिर यह अपनी क्षमता के किसी भी जानवर का शिकार करता है। त्वचा, हडि्डयां और सभी पार्ट्स को वह पेट में भर लेता है। दुनिया भर में बार्न उल्लू की 46 किस्में पाई जाती है। उत्तरी अमेरिका में यह सबसे अधिक पाया जाता है। बार्न आउल की आयु को लेकर दावा किया जाात है कि यह 15 साल के करीब जीता है।

डॉक्टरों ने की पहचान
कानपुर में पकड़े गए बार्न आउल की पहचान चिड़िया घर में हुई। यहां तक उसे सफेद उल्लू मानकर पकड़कर लाया गया था। डॉक्टरों ने जांच के बाद इसे बार्न आउल बताया। इसको दिन में कम दिखाई देता है। इस कारण वह तेजी से भाग पाने में कामयाब नहीं हो सका और पकड़ गया। हालांकि, पहचान होने के बाद बार्न आउल को चिड़िया घर प्रशासन ने खुले आसमान में छोड़ दिया। बार्न आउल की विशेषता है कि अगर उसे पिंजरे में कैद किया गया तो वह खाना पीना छोड़ देता है। कानपुर जू के डॉक्टरों ने उसकी जांच की। पक्षी का सभी सिस्टम सही पाए जाने के बाद उसे आजाद कर दिया गया।

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