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आर्यभट्ट, वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त… चांद के बारे में हजारों साल पहले उन्होंने जो सोचा, सच निकला

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नई दिल्ली

भारत का चंद्रयान-3 मिशन इतिहास रचने के बेहद करीब है। चंद्रयान-3 का लैंडर मॉड्यूल (एलएम) चंद्रमा की सतह को छूने को तैयार है। इसरो ने ट्वीट कर बताया कि चंद्रयान-3 के लैंडिंग की प्रक्रिया को पूरा कर लिया गया है। हालांकि, चांद को लेकर सैकड़ों साल पहले से हमारे मशहूर खगोलशास्त्री जानकारियां देते रहे हैं। इसके साथ ही आर्यभट्ट, वराहमिहिर जैसे विद्वानों ने चंद्रमा को लेकर कई प्रचलित हिंदू धारणाओं को भी खारिज किया है। बात चाहे चंद्रग्रहण के कारण की हो या फिर चंद्रमा की चमक के पीछे की वजह की। चंद्रमा हमेशा से ही खगोलशास्त्र में अहम विषय रहा है।

आर्यभट्ट : चंद्रमा को निगलने की अवधारणा को किया खारिज
आर्यभट्ट भारत के महान गणितज्ञ और खगोल विज्ञानी थे। आर्यभट्ट ने उस धारणा को खारिज किया था जिसमें कहा जाता था कि राहु चंद्रमा को निगल लेता है। महज 23 साल की उम्र में आर्यभट्ट ने यह पता लगाया था कि धरती अपनी धुरी पर घूमती है। आर्यभट्ट ने यह भी पता लगाया कि चन्द्रमा और सूर्य के बीच पृथ्वी के आ जाने से और उसकी छाया चंद्रमा पर पड़ने से ‘चंद्रग्रहण’ होता है। इससे हिंदू धर्म की यह मान्यता खारिज हो गई कि राहु नामक ग्रह सूर्य और चन्द्रमा को निगल जाता है। इससे सूर्य और चन्द्र ग्रहण होते हैं।

वराहमिहिर : चंद्रमा की चमक का रहस्य
वराहमिहिर विलक्षण भारतीय खगोलशास्त्री थे। वे ज्योतिष विद्या में भी पारंगत थे। इसके साथ ही वे प्रतिष्ठित गणितज्ञ भी थे। वे प्रमुख भारतीय ऋषि थे जिन्होंने लगभग 1500 साल पहले मंगल ग्रह पर पानी की उपलब्धता की भविष्यवाणी की थी। वराहमिहिर ने अंतरिक्ष और ब्रह्मांड के बारे में जो भी अंतर्दृष्टि दी वे आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए है। वराहमिहिर ने ही बताया था कि चंद्रमा और अन्य ग्रह सूर्य के प्रकाश के कारण चमक रहे हैं। वराहमिहिर ने सूर्य सिद्धांत की रचना की थी।

ब्रह्मगुप्त : चंद्रग्रहण के सिद्धांत को किया खारिज
ब्रह्मगुप्त भारत के महान गणितज्ञों में शामिल थे। ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट्‌ट और वराहमिहिर के ज्योतिष सम्बन्धी सिद्धान्तों तथा गणित के कुछ नियमों में संशोधन किया। ब्रह्मगुप्त भारत के ऐसे पहले गणितज्ञ थे, जिन्होंने बीजगणित का प्रयोग ज्योतिष और खगोलशास्त्र की गणनाओं में किया। ब्रह्मगुप्त ने कुछ नए यंत्रों का आविष्कार करके वेधशाला की स्थापना की। इसके जरिये ग्रह और तारों की गति, स्थितियों का अध्ययन किया। ब्रह्मगुप्त ने पृथ्वी की परिभ्रमण गति तथा चन्द्रग्रहण एव सूर्यग्रहण से सम्बन्धित आर्यभट्‌ट एवं वराहमिहिर के सिद्धान्तों का खण्डन किया।

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