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BJD, YSR, JDS… विपक्षी महाजुटान से दूरी बनाने वाले दलों की सियासी ताकत कितनी?

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नई दिल्ली,

पटना में कल यानी 23 जून को विपक्षी दलों का महाजुटान है. एक मंच पर करीब 18 दलों के नेताओं को लाकर शक्ति प्रदर्शन किया जाएगा. बैठक में 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हराने के लिए रणनीति बनाई जाएगी. इस बैठक में ज्यादा से ज्यादा नेताओं को शामिल करने के लिए बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने दिल्ली से लेकर दक्षिण तक सफर किया था. उन्होंने अपने दौरों में कांग्रेस नेताओं के अलावा अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, हेमंत सोरेन, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, ओम प्रकाश चौटाला, जयंत चौधरी, मौलाना बदरुद्दीन अजमल समेत सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई माले के नेताओं से मुलाकात कर उन्हें एकजुटता बैठक में शामिल होने का न्योता दिया था.

इनमें से तेलंगाना सीएम केसीआर, ओडिशा सीएम नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश के सीएम जगन मोहन रेड्डी और जेडीएस नेता कुमारस्वामी ने स्पष्ट रूप से बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया है. जानते हैं कि इनक दलों की राजनीतिक ताकत क्या है और साथ न आने से विपक्ष को कितना प्रभावित कर सकते हैं.

एच. डी. कुमारस्वामी: जेडीएस
वह जेडीएस बैठक में नहीं शामिल होंगे. 6 जून को बेंगलुरु में पार्टी सुप्रीमो एचडी देवगौड़ा ने बीजेपी विरोधी मोर्चा बनाने की कोशिशों पर कहा था कि क्या देश में एक भी पार्टी ऐसी है, जिसका बीजेपी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कोई संबंध नहीं है? उन्होंने कहा कि वह इस देश की राजनीति का विस्तार से विश्लेषण कर सकते हैं लेकिन इसका क्या फायदा.

कर्नाटक में जेडीएस की अच्छी पकड़ मानी जाती है लेकिन इस बार हुए विधानसभा चुनावों में उसकी सीटें कम हो गईं. उसे 19 सीटों मिली यानी उसे 13.3 फीसदी वोट मिले. जबकि 2018 में उसे 37 सीटें मिली थीं. इससे पहले 2013 में 40 सीटें, 2008 में 28 सीटें और 2004 में 58 सीटें मिली थीं यानी 1999 में गठित हुई पार्टी लगातार अपना जनाधार खो रही है. वहीं लोकसभा में मौजूदा समय में जेडीएस का केवल एक सांसद ही है. कांग्रेस और बाकी दल मजबूत हो रहे हैं यानी जेडीएस अब किंगमेकर राज्य में उसकी रिश्ते कांग्रेस से सही नहीं हैं. वैसे एचडी देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. यह समुदाय उनका कोर वोटबैंक माना जाता है. प्रदेश में इस समुदाय के लोगों की आबादी करीब 12 फीसदी है. इन सबके बीच चर्चा है कि जेडीएस बीजेपी के संपर्क में है. उसने लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी से चार सीटों की मांग की है.

जगन मोहन रेड्डी: YSR कांग्रेस
आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की सरकार है. 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में उनके नेतृत्व में पार्टी ने 175 सीटों में से 151 सीटें जीत हासिल थी. उनकी पार्टी 84 नई सीटों पर कब्जा किया था यानी मौजूदा समय में प्रदेश में उनकी मजबूत पकड़ है. वहीं क्षेत्रीय पार्टियों में तुलना की जाए तो लोकसभा में उनके 22 सांसद हैं यानी विपक्षी दलों के साथ न आने पर विपक्षी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. जगन मोहन रेड्डी की राजनीति ताकत के कारण ही बीजेपी उन पर नजर गढ़ाए हुए हैं. वैसे जगन भी बीजेपी ने नजदीकी बनाए रखने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दे रहे हैं. ऐसे में भले ही वह एनडीए में शामिल न हों, लेकिन कई मुद्दों पर मोदी सरकार का समर्थन करते रहे हैं. वह ऐसे विपक्षी मुद्दों पर भी किनारा करते रहे हैं, जिनके साथ कांग्रेस खड़ी होती रही है.

नवीन पटनायक: बीजू जनता दल
ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजद प्रमुख नवीन पटनायक ने पिछले दिनों विपक्षी एकता में जुटे नीतीश कुमार से मुलाकात की थी. हालांकि, इस मुलाकात के बाद उन्होंने साफ कर दिया था कि वे लोकसभा और विधानसभा में अकेले चुनाव लड़ेंगे. पटनायक की पूरी राजनीति कांग्रेस के खिलाफ रही है. इतना ही नहीं पटनायक ऐसे नेता माने जाते हैं, जिनका पूरा फोकस ओडिशा की राजनीति पर ही रहा है. केंद्रीय मुद्दों से वे अक्सर दूरी बनाकर चलते हैं. यही वजह है कि उन्होंने उद्घाटन समारोह में शामिल होने का ऐलान किया है.

अगर पटनायक की राजनीतिक ताकत की बात की जाए तो लोकसभा में उनके 12 सांसद हैं. क्षेत्रीय दलों में अगर तुलना की जाए तो यह संख्या काफी ज्यादा है. वहीं मौजूदा समय में राज्य की 146 विधानसभा सीटों में से नवीन पटनायक की पार्टी 112 सीट पर कब्जा कर रखा है. यानी केंद्र और राज्य दोनों की जगहों पर पटनायक मजबूत स्थिति में हैं. ऐसे में बीजद का विपक्ष के साथ न होना लोकसभा चुनाव में नुकसान पहुंचा सकता है.

के चंद्र शेखर राव: बीआरएस
तेलंगाना के सीएम केसीआर और कांग्रेस में राजनीतिक टकराव किसी से छुपा नहीं है. कर्नाटक में चुनाव जीतने के बाद शपथ ग्रहण समारोह के लिए कांग्रेस ने कई विपक्षी दलों को न्योता दिया था लेकिन उसने केसीआर को नियमंत्रण नहीं भेजा था. इसके बाद केसीआर ने कांग्रेस ने हमला बोलेत हुए कहा था- ‘हाल ही में आपने कर्नाटक चुनाव देखा है, बीजेपी सरकार हार गई और कांग्रेस सरकार जीत गई. कोई जीत गया, कोई हार गया. लेकिन क्या बदलेगा? क्या कोई बदलाव होगा.नहीं, कुछ बदलने वाला नहीं है. पिछले 75 सालों से कहानी दोहराती रहती है, लेकिन उनमें कोई बदलाव नहीं है.’ यानी पटना में होने वाली बैठक में केसीआर के शामिल न होने के पीछे एक बड़ी वजह कांग्रेस है.

वहीं बीआरएस ने खम्मम में एक महारैली का आयोजिन किया था लेकिन इस महारैली में नीतीश और तेजस्वी नहीं दिखे थे. तब नीतीश ने कहा था कि जिन लोगों को रैली में बुलाया गया था, वे वहां पहुंचे होंगे. यानी केसीआर पहले से विपक्षी एकजुटता से दूरी बनाने का मन बना चुके थे. वैसे तेलंगाना की 119 विधानसभा सीटों में 88 पर बीआरएस का कब्जा है. इससे पहले उसकी राज्य में 63 सीटें थी. यानी केसीआर की राजनीतिक ताकत बढ़ी है. वहीं लोकसभा में भी टीआरएस के 9 सांसद हैं यानी टीआरएस का सपोर्ट किसी भी दल के मायने रखता है.

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