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हिंडनबर्ग की रिपोर्ट पर हुई मांग, वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में जेपीसी जांच का ट्रैक रिकॉर्ड कैसा है?

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नई दिल्ली

हिंडनबर्ग रिसर्च के आरोपों को लेकर कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (SEBI) की प्रमुख माधवी बुच के इस्तीफे की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि अडानी समूह से जुड़े मामले की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच होनी चाहिए। दूसरी तरफ, बीजेपी ने जेपीसी से जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया है। बीजेपी का कहना है कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करने और देश में निवेश को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा रहा ढकोसला है। अब सवाल उठता है कि विपक्ष आखिर जेपीसी जांच की मांग क्यों कर रहा है। वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में जेपीसी का रिकॉर्ड आखिर कैसा है?

जेपीसी क्या है?
संयुक्त संसदीय समिति एक अस्थायी समूह होती है जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। इन सदस्यों की संख्या लोकसभा और राज्यसभा में पार्टियों की ताकत के अनुपात में होती है। इसमें लोकसभा के सदस्यों की संख्या राज्यसभा के सदस्यों की संख्या से दोगुनी होती है। इस तरह, जेपीसी एक छोटी संसद की तरह काम करती है जो किसी खास विषय पर गहराई से जांच-पड़ताल करती है और एक निश्चित समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट देती है। संयुक्त समिति की स्थापना एक सदन में पारित प्रस्ताव और दूसरे सदन की सहमति से होती है। किसी विशेष जेपीसी के सदस्यों की संख्या और उसके काम के बारे में संसद ही फैसला करती है।

जेपीसी कैसे करती है जांच?
जेपीसी किसी भी मंत्रालय या संस्था के दस्तावेजों की जांच कर सकती है। इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों से सवाल-जवाब कर सकती है। अगर जेपीसी में कुछ सदस्य बहुमत की राय से सहमत नहीं होते हैं, तो वे अपनी अलग राय लिख सकते हैं। समिति की सिफारिशों पर क्या कार्रवाई होगी, यह सरकार पर निर्भर करता है। अगर सरकार चाहे तो जेपीसी की रिपोर्ट के आधार पर जांच करा सकती है। लेकिन सरकार को कम से कम यह बताना ही होगा कि उसने समिति की सिफारिशों पर क्या किया है।

सरकार के जवाब के आधार पर, समिति संसद में एक ‘कार्रवाई की गई रिपोर्ट’ पेश करती है। इस रिपोर्ट पर संसद में चर्चा हो सकती है। साथ ही विपक्ष सरकार से सवाल पूछ सकता है। विपक्ष के लिए जेपीसी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि उसे किसी कथित घोटाले के बारे में सभी जानकारी मिल जाती है। इसके साथ ही वह इस मुद्दे को चर्चा में बनाए रख सकता है। इससे सरकार पर काफी राजनीतिक दबाव पड़ता है। इसलिए सभी सरकारें जेपीसी की मांग का विरोध करती हैं।

वित्तीय धोखाधड़ी केस में ट्रैक रिकॉर्ड कैसा है?
अब तक, कथित वित्तीय अपराधों की जांच के लिए केवल तीन जेपीसी का गठन किया गया है। 1992 के हर्षद मेहता से संबंधित प्रतिभूति और बैंकिंग सौदे मामले में जेपीसी का गठन हुआ था। 2001 में केतन पारेख शेयर बाजार घोटाले पर जेपीसी का गठन हुआ था। साल 2013 में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले मामले में भी जेपीसी गठित हुई थी। इसके अलावा बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए गठित जेपीसी भी महत्वपूर्ण थी। 2013 में वीवीआईपी अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले और कथित बिचौलियों की भूमिका की जांच के लिए गठित जेपीसी में बीजेपी के हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था। इसके बाद जेपीसी जांच का काम करना शुरू ही नहीं हुआ था।

2जी स्पेक्ट्रम (2013): जेपीसी की रिपोर्ट में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को गलत काम करने से मुक्त कर दिया गया, यह कहते हुए कि उन्हें दूरसंचार विभाग द्वारा यूनिफाइड एक्सेस सर्विसेज लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया के बारे में गुमराह किया गया था। बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। केतन पारेख मामले में शेयर बाजार के नियमों में व्यापक बदलाव की सिफारिश की गई थी। हालांकि, सिफारिशों को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया। केतन पारेख को दोषी ठहराया गया था। हर्षद मेहता मामले में उसे कोर्ट से सजा सुनाई गई लेकिन जेपीसी की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया।

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