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यूपी पुलिस की साख पर सवाल उठाते लोगो पर लगे फर्जी केस, कोर्ट में भी करा चुके हैं सरकार की किरकरी, क्या लगेगी रोक?

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लखनऊ

उत्तर प्रदेश की पुलिस पर कई बार सवाल उठते रहे हैं। आजम खान की भैंस खोजने की घटना से लेकर ठांय-ठांय एनकाउंटर तक को लेकर यूपी पुलिस सवालों के घेरे में आ गई है। वहीं, अब फर्जी केस के मामलों ने यूपी पुलिस की साख पर सवाल खड़ा कर दिया है। ताजा मामला फर्रुखाबाद का है। अगस्त में बाइक मैकेनिक को गलत तरीके से जेल भेजने के मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया गया है। इसके साथ ही फर्जी केस का मुद्दा जोर पकड़ने लगा है। इस मामले में एडीजी कानपुर जोन के आदेश पर मोहम्मदाबाद थाने के तत्कालीन प्रभारी मनोज भाटी, दरोगा महेंद्र सिंह, कॉन्स्टेबल अंशुमन, राजनपाल और यशवीर सिंह को नामजद आरोपी बनाया गया है।

कौशांबी केस में भी एफआईआर
कौशांबी के सर्राफा व्यवसायी से लूटकांड के आरोपी विजय कुमार सोनी के एनकाउंटर मामले में भी पुलिस बुरी तरह फंसी। कोर्ट ने SOG प्रभारी, थाना प्रभारी चरवा समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था। विजय की मां अंजू देवी की ओर से प्रयागराज के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया था कि 10 सितंबर 2023 को चरवा थाना प्रभारी विनोद कुमार सिंह, एसओजी प्रभारी सिद्धार्थ सिंह दो गाड़ियों में पुलिस टीम के साथ घर आए थे। उनके बेटे को घर से उठा ले जाया गया।

अंजू देवी ने आरोप लगाया कि लूट में फर्जी बरामदगी दिखाकर 12 सितंबर को विजय के कंधे में गोली मार दी गई। इलाज के दौरान उसकी स्वरूप रानी अस्पताल प्रयागराज में 21 सितंबर को मौत हो गई। मृतक की मां की ओर से दाखिल अर्जी को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने थाना प्रभारी को सभी 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच का आदेश दिया।

लंबे समय से लगते रहे हैं आरोप
यूपी पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर और केस दर्ज कराए जाने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। पिछले दिनों सुल्तानपुर लूट कांड के बाद मंगेश यादव एनकाउंटर पर विपक्षी दलों की ओर से सवाल उठाया गया। हालांकि, इसे जातीय एंगल दे दिया गया। इसके अलावा फर्जी एनकाउंटर के मामले मेरठ, पीलीभीत से लेकर एटा तक से आते रहे हैं। इन पर कोर्ट के फैसलों के बाद चर्चा गरमाती रही है।

एटा में बढ़ई एनकाउंटर: उत्तर प्रदेश के एटा में साल 2006 में हुए फर्जी एनकाउंटर मामले में सीबीआई कोर्ट ने 21 दिसंबर 2022 को सजा का ऐलान किया था। फर्जी एनकाउंटर केस में पांच आरोपी पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई। उन्हें आजीवन कारावास के साथ 33-33 हजार रुपये जुर्माना की सजा सुनाई गई।

इस मामले में चार अन्य आरोपियों को 5 साल की सजा के साथ 11000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस मामले में एक आरोपी की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी थी। 16 साल बाद सुनाए गए फैसले ने 2006 के बढ़ई राजा राम के फर्जी एनकाउंटर मामले को चर्चा में लाया था। उसकी पत्नी ने पुलिस के खिलाफ लड़ाई लड़कर उन्हें सजा दिलवाई थी।

पीलीभीत एनकाउंटर में सजा: 1991 पीलीभीत फर्जी एनकाउंटर मामले में 43 पुलिसकर्मियों के उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। दिसंबर 2022 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस सजा को 7 साल के सश्रम कारावास में बदल दिया था। इस फर्जी मुठभेड़ में 10 सिखों को आतंकवादी बताकर उनकी हत्या कर दी गई थी। हाई कोर्ट ने निचली अदालत की ओर से पुलिसकर्मियों को आईपीसी की धारा-302 के तहत सुनाई गई।

हाई कोर्ट ने सजा को दरकिनार करते हुए कहा कि मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 303 के अपवाद 3 के तहत आता है। इसे गैर इरादतन हत्या का मामला बताया गया। इस मामले में हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने आदेश दिया कि दोषी अपनी जेल की सजा काटेंगे। सभी आरोपी पुलिसकर्मियों पर 10-10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया।

दरअसल, 12 जुलाई 1991 को नानकमथा पटना साहिब, हुजूर साहिब और अन्य तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हुए 25 सिख यात्रियों का जत्था बस से लौट रहा था। पीलीभीत के कछाला घाट के पास पुलिस वालों ने बस को रोक लिया। 11 युवकों को उतारकर अपनी नीली बस में बैठा लिया। बाद में इनमें से 10 की लाश मिली। इसी मामले में आरोपियों को सजा सुनाई गई थी।

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