कोलंबो:
श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने गुरुवार को अपने पद से हटने पर चुप्पी तोड़ी है। एक किताब में उन्होंने इसके बारे में खुलासा करते हुए कहा कि चीन और अन्य देशों के बीच ‘भू-राजनीतिक लड़ाई’ के कारण उनका पतन हुआ। श्रीलंका में आर्थिक संकट के कारण जनता सड़कों पर उतर गई थी। कई महीनों के प्रदर्शन के बाद 2022 में प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के आवास में धावा बोल दिया। लेकिन इससे पहले ही राजपक्षे देश छोड़ चुके थे। अपनी किताब ‘द कॉन्सपिरेसी’ में उन्होंने अपनी सरकार की आर्थिक नीतियों का बचाव किया।
हालांकि इसी के कारण श्रीलंका को डिफॉल्च होना पड़ा और कई महीनों तक ईंधन और भोजन का संकट देखा गया। लेकिन उन्होंने अपनी आर्थिक नीतियों को जिम्मेदार ठहराने की जगह कहा कि 2006 के बाद श्रीलंका में चीनी वित्त पोषित इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं जियोपॉलिटिक्स भी अपने साथ लाईं, जिसने उन्हें उखाड़ फेंका। उन्होंने कहा, ‘किसी के लिए भी यह दावा करना बेहद मूर्खतापूर्ण होगा कि मुझे सत्ता से हटाने के लिए उठाए गए कदम में किसी विदेशी ताकत का हाथ नहीं था।’
प्रदर्शनकारियों को मिली विदेश से फंडिंग
राजपक्षे ने इस दौरान किसी देश का नाम नहीं लिया। हालांकि अमेरिका लगातार श्रीलंका को चीन के कर्ज के जाल में फंसने से जुड़ी चेतावनी देता रहा है। श्रीलंका से भागने के लिए उन्होंने एक सैन्य विमान का इस्तेमाल किया। बाद में सिंगापुर से उन्होंने अपना इस्तीफा ईमेल किया। लेकिन अब वह वापस लौट आए हैं। उन्होंने बिना कोई सबूत दिए आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल के अंतिम महीनों में जो प्रदर्शनकारी सड़क पर उतरे उनके पास विदेशी फंडिंग थी।
चीन ने श्रीलंका में बनाए प्रोजेक्ट
चीन ने श्रीलंका में कई प्रोजेक्ट को फंड किया है। इसमें हंबनटोटा में कन्वेंशन सेंटर और हवाई अड्डा शामिल है, जिसे शायद ही कभी इस्तेमाल किया जाएगा। इसी कारण से लोगों ने इसे सफेद हाथी करार दिया। श्रीलंका पर चीन का सबसे ज्यादा कर्ज भी है। राजपक्षे को 2019 में बहुमत से चुना गया था। लेकिन तीन साल से भी कम समय में श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के साथ ही उनकी लोकप्रियता भी कम हो गई। देश में खाने पीने का संकट देखा गया। साथ ही पेट्रोल की लंबी-लंबी कतारें देखी गईं।
