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गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या के लिए ₹500 में खरीदी थी पिस्टल, ग्वालियर से पहुंचा था दिल्ली

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भोपाल

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी के एक बयान पर विवाद शुरू हो गया है। तुषार गांधी ने कहा है कि नाथूराम गोडसे ने जिस पिस्टल से बापू की हत्या की थी, उसे दिलाने में वीर सावरकर ने उनकी मदद की थी। गांधीजी की हत्या में सावरकर की भूमिका पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया था। नाथूराम गोडसे ने अपने बयान में भी कहा था कि इसमें सावरकर की कोई भूमिका नहीं थी। तुषार गांधी के ताजा बयान पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया है।

ग्वालियर में 500 रुपये में खरीदी थी पिस्टल
30 जनवरी, 1948 को गांधीजी की हत्या से दस दिन पहले भी इसकी कोशिश की गई थी, लेकिन यह सफल नहीं हो पाई थी। इसके बाद गोडसे दिल्ली से ग्वालियर आ गया था। उस समय ग्वालियर हिंदू महासभा का गढ़ था। गोडसे ने यह फैसला भी किया था कि अब वह खुद ही महात्मा गांधी की हत्या करेगा। इसके लिए उसे हथियार की जरूरत थी। ग्वालियर में उसने डॉ डीएस परचुरे की मदद से अच्छी पिस्टल की तलाश शुरू की। परचुरे के परिचित गंगाधर दंडवते ने 500 रुपये में उसे पिस्टल दिलवाई थी।

सिंधिया सेना के अफसर की थी पिस्टल
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सिंधिया रियासत के सैनिकों की एक टुकड़ी ले.ज. वीबी जोशी की कमान में अबीसीनिया में तैनात की गई थी। मुसोलिनी की सेना के एक दस्ते ने हथियारों के साथ इस टुकड़ी के सामने समर्पण कर दिया था। इन्हीं हथियारों में 1934 में बनी 9एमएम की बरेटा पिस्टल भी थी। ले.ज. जोशी ने इसे अपने पास रख लिया था। बाद में उनके वारिसों से जगदीश गोयल ने यह पिस्टल खरीद ली थी। गंगाधर दंडवते की मदद से गोडसे को यही पिस्टल मिली थी।

स्वर्णरेखा नदी के किनारे की थी प्रैक्टिस
पिस्टल और गोलियां खरीदने के बाद गोडसे ने ग्वालियर में ही इसको चलाने की प्रैक्टिस की थी। उसने स्वर्णरेखा नदी के किनारे इससे कई फायर किए थे। जब उसे भरोसा हो गया कि पिस्टल में कोई समस्या नहीं है और वह इसे आसानी से चला सकता है, तब वह दादर-अमृतसर पठानकोट एक्प्रेस में बैठ कर दिल्ली रवाना हो गया था।

प्रार्थना सभा में मारी थीं तीन गोलियां
30 जनवरी 1948 की शाम को पांच बजे महात्मा गांधी दिल्ली में प्रार्थना सभा के लिए निकले थे। उस दिन प्रार्थना में ज्यादा भीड़ थी। फौजी कपड़ों में नाथूराम गोडसे अपने साथियों करकरे और आप्टे के साथ भीड़ में शामिल हो गया। महात्मा गांधी के साथ उनकी दो सहयोगी, आभा और तनु भी थीं। गोडसे ने बापू के पैर छूने के बहाने तनु और आभा को एक तरफ किया। पैर छूते हुए ही उसने पिस्टल निकाल ली और तीन गोलियां महात्मा गांधी के शरीर में दाग दी थीं।

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