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अगर गवर्नर बिलों को मंजूरी देने से इनकार करे तो क्या आर्टिकल 200 के 3 प्रावधानों का उद्देश्य खत्म नहीं हो रहा? सुप्रीम कोर्ट ने पूछा

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल आर.एन. रवि के बीच चल रहे टकराव में अहम सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि क्या राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर सहमति देने से इनकार करने से संविधान के अनुच्छेद 200 के तीन प्रावधान बेअसर हो जाते हैं? ये प्रावधान विधेयकों पर सहमति देना, राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के लिए भेजना या विधानसभा को पुनर्विचार के लिए वापस करना हैं।

यह मामला राज्यपाल के कार्यों और निष्क्रियता को चुनौती देने वाली तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान उठा। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने राज्यपाल का प्रतिनिधित्व कर रहे अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि से कई सवाल पूछे। सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

तमिलनाडु सरकार ने राज्यपाल आर.एन. रवि पर विधानसभा की तरफ से पारित विधेयकों पर सहमति देने से इनकार करने का आरोप लगाया है। सरकार का कहना है कि राज्यपाल जानबूझकर विधेयकों को रोक रहे हैं, जिससे राज्य का कामकाज प्रभावित हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में राज्यपाल के अधिकारों और कर्तव्यों की व्याख्या करेगा। कोर्ट के फैसले का देश के अन्य राज्यों पर भी असर पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि राज्यपाल दोबारा पारित विधेयकों को राष्ट्रपति के पास कैसे भेज सकते हैं? बेंच ने अटॉर्नी जनरल से राज्यपाल की ओर से ऐसा कोई संचार दिखाने को भी कहा जिसके माध्यम से उन्होंने राज्य सरकार को अपनी आपत्तियां बताई हों।

जस्टिस पारदीवाला ने टिप्पणी की, ‘आज हमें हर समय यही बताया गया है कि राज्यपाल के मन में यही बात थी। राज्य सरकार को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई? अगर राज्यपाल ने कमियों की ओर इशारा किया होता तो शायद सरकार उन कमियों को दूर कर लेती।’

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि अगर राज्य सरकार को पता ही नहीं कि राज्यपाल के मन में क्या चल रहा है तो वह किस बात पर पुनर्विचार करेगी? बेंच ने यह भी पूछा कि क्या राज्यपाल के पास राज्य विधानसभा की तरफ से पारित विधेयकों पर अपनी सहमति रोकने का कोई विवेकाधिकार है? बेंच ने पूछा कि क्या विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेजने से पहले राज्यपाल के लिए मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह लेना अनिवार्य है?

यह मामला राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच अधिकारों के बंटवारे का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। संविधान के अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के पास विधेयकों पर सहमति देने, उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजने या उन्हें विधानसभा को वापस करने की शक्ति है। हालांकि, इस अनुच्छेद में राज्यपाल के विवेकाधिकार की सीमा स्पष्ट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले में स्पष्टता ला सकता है और भविष्य में ऐसे विवादों को रोकने में मदद कर सकता है। इस फैसले का देश के संघीय ढांचे पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला बताएगा कि क्या राज्यपाल के अधिकार असीमित हैं या नहीं।

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