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रूस से खरीदे हथियारों का भुगतान नहीं कर पा रहा भारत, बढ़ी टेंशन

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नई दिल्ली,

रूस ने भारत को 28 हजार करोड़ के हथियार बेचे हैं. लेकिन पिछले साल फरवरी में यूक्रेन के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से रूस पर कड़े प्रतिबंध लगे हुए हैं. जिस कारण भारत अभी तक रूस को यह भुगतान नहीं कर पाया है.यूक्रेन के साथ जंग के कारण पश्चिमी देशों और अमेरिका की ओर से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध का सामना कर रहे रूस को भारत अपना बकाया राशि देने का विकल्प को खोज रहा है.

चूंकि, भारत अधिकांश सैन्य हथियार और हार्डवेयर रूस से खरीदता है. ऐसे में सरकार चिंतित है कि भुगतान में और देरी होने पर महत्वपूर्ण कल-पुर्जों और उपकरणों की डिलीवरी में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. भारत रूस के साथ अनुबंधों के तहत लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली S-400 मिसाइल, रूस में निर्मित टुशिल क्लास के शिप, मल्टीपल रॉकेट लान्चर Smerch , रॉकेट प्रोजेक्टाइल और X-31 मिसाइल खरीदता है. इसके अलावा अन्य कई मिसाइलें और सेना के हथियार और उपकरण भी शामिल हैं.

भुगतान के तीन विकल्प पर चर्चा
भारत रूस से कच्चा तेल और हथियार खरीदता है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने शनिवार को एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा था कि भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने अमेरिकी डॉलर के बजाय दुबई बेस्ड ट्रेडर्स के माध्यम से यूएई की मुद्रा दिरहम में भुगतान शुरू कर दिया है.
अंग्रेजी अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, एक शीर्ष अधिकारी ने बताया है कि भारत रूस के बकाये को चुकाने के लिए तीन विकल्पों पर विचार कर रहा है. इसमें एक विकल्प चीनी युआन और यूएई दिरहम में रूबल भुगतान शुरू करना है.

सूत्रों के अनुसार, इस मामले पर पिछले साल भी रूस के अलावा रक्षा और वित्त मंत्रालयों के अधिकारियों के बीच आंतरिक रूप से चर्चा हुई थी. इसमें यह निर्णय लिया गया था कि बकाया भुगतान के विकल्पों पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ चर्चा की जाएगी.

अधिकारियों ने कहा कि भारत भले ही किसी तीसरे देश की विदेशी मुद्रा के माध्यम से भुगतान का विकल्प ढूंढ रहा है. लेकिन अधिकांश रक्षा सौदों की ‘संवेदनशील’ प्रकृति के कारण भारत संशय में है. वहीं, एक अन्य अधिकारी ने कहा, हम भले ही दिरहम और युआन को विकल्प के तौर पर देख रहे हैं. लेकिन युआन के साथ हम उतना सहज नहीं हैं.

सॉवरेन बॉन्ड जारी कर सकती है सरकार
इसके अलावा, भारत सरकार सॉवरेन बॉन्ड के माध्यम से भी बकाया भुगतान करने का विकल्प तलाश रही है. वहीं, एक अधिकारी ने यह भी कहा कि इस बात पर भी चर्चा की जा रही है कि क्या रूस की बकाया राशि भारत के एक अलग खाते में ट्रांसफर की जा सकती है. इससे सरकार जमा राशि पर सॉवरेन गारंटी जारी कर सकती है. अधिकारी ने यह भी बताया कि इसे हाइब्रिड विकल्प इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि सॉवरेन बॉन्ड का इस्तेमाल आमतौर पर बकाया चुकाने के लिए नहीं किया जाता है.

वहीं, तीसरे विकल्प के रूप में रूस ने सुझाव दिया है कि सरकार के स्वामित्व वाले उद्यमों में रूस को कुछ हिस्सेदारी की पेशकश की जाए. जिसे बाद में भुगतान के बाद समाप्त किया जा सकता है. एक दूसरे सरकारी अधिकारी ने बताया कि एक विकल्प का प्रयोग भारत और रूस के संयुक्त उद्यमों में भी किया जा सकता है. जहां रूस के बदले भारत अस्थायी रूप से निवेश कर सकता है.

2018 से हालात अलग
यह पहली बार नहीं है जब भारत को रूसी बकायों को भुगतान करने में समस्याओं का सामना करना पड़ा हो. इससे पहले वर्ष 2018 में जब भारत ने रूस के साथ S-400 मिसाइल सौदा पर हस्ताक्षर किया था, उस वक्त भी इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा था. 2018 में भी अमेरिका ने अपने विरोधियों को काउंटर करने के लिए प्रतिबंध अधिनियम सीएएटीएसए के माध्यम से रूस पर प्रतिबंध लगा दिया था.

हालांकि, उस समय भारत दो रूसी बैंक VTB और Sberbank की भारतीय ब्रांचों के माध्यम से रक्षा संबंधी बकाया भुगतान कर दिया था. सरकार ने रूस को डॉलर के बराबर भारतीय रुपये में भुगतान किया था. लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में इस बैंक पर प्रतिबंध लगा हुआ है.

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