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भूख सूचकांक में भारत की स्थिति पाकिस्तान और नेपाल से भी खराब, 121 देशों में 107वें पायदान पर रहा

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नई दिल्ली

दुनिया के 121 देशों को लेकर तैयार किए गए वैश्विक भूख सूचकांक में भारत अपने पड़ोसी देशों से भी पीछे है। हंगर इंडेक्स में भारत 107वें पायदान पर रहा है जबकि श्रीलंका 64वें, नेपाल 81वें, बांग्लादेश 84वें और पाकिस्तान 99वें स्थान पर है। दक्षिण एशिया में अफगानिस्तान (109) अकेला ऐसा देश है जो इंडेक्स में भारत से भी खराब स्थिति में है। पिछले साल 116 देशों में भारत 101वें स्थान पर रहा था। दरअसल, ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) के जरिए हर साल वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भूख की स्थिति को मापा और ट्रैक किया जाता है। इसकी गणना चार संकेतकों के आधार पर की जाती है, जिसमें कुपोषण, बच्चों में भयंकर कुपोषण (5 साल से कम उम्र के बच्चे जिनका वजन ऊंचाई के हिसाब से कम है), बच्चों के विकास में रुकावट (जिन बच्चों का वजन उनकी उम्र के हिसाब से कम है) और बाल मृत्युदर शामिल है।

GHI स्कोर 100 पॉइंट के स्केल पर मापा जाता है जो भूख की गंभीरता को प्रदर्शित करता है। जीरो को बेस्ट स्कोर माना जाता है यानी भुखमरी की स्थिति नहीं है और 100 का मतलब बुरी स्थिति से है। भारत का स्कोर (29.1) गंभीर श्रेणी में आया है। चीन उन देशों में से है, जिनकी रैंकिंग 1 और 17 के बीच आई है और स्कोर पांच से भी कम है।

भारत की स्थिति
भारत का चाइल्ड वेस्टिंग रेट (ऊंचाई के हिसाब से कम वजन) 19.3 प्रतिशत है, जो 2014 में (15.1 प्रतिशत) और 2000 में (17.15 प्रतिशत) से भी खराब स्थिति है। यह दुनिया में सबसे ज्यादा है। अपर्याप्त कैलोरी वाली जनसंख्या का अनुपात भी 2018-2020 में 14.6 प्रतिशत से बढ़कर 2019-2021 में 16.3 प्रतिशत हो गया है। इस हिसाब से देखें तो वैश्विक स्तर पर अल्प-पोषण वाली कुल 828 मिलियन आबादी में से भारत में 224 मिलियन लोग हैं।

हालांकि बाकी दो इंडिकेटर्स में भारत का प्रदर्शन सुधरा है। चाइल्ड स्टंटिंग 2014 में 38.7 प्रतिशत से घटकर 2022 में 35.5 प्रतिशत पर आ गया है। बाल मृत्युदर भी इस अवधि में 4.6 प्रतिशत से घटकर 3.3 प्रतिशत रह गई है। कुल मिलाकर GHI स्कोर बढ़ने से (2014 में 28.2 और 2022 में 29.1) भारत की स्थिति खराब ही हुई है।

वैश्विक स्तर पर देखें तो 2022 का जीएचआई स्कोर मॉडरेट श्रेणी में रहा है। यह 2014 में 19.1 से थोड़ा सुधरकर 2022 में 18.2 रहा। हाल में दुनिया को कोरोना महामारी, आर्थिक संकट, जलवायु परिवर्तन और यूक्रेन युद्ध जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा है। इससे वैश्विक स्तर पर खाद्य, ईंधन और उर्वरक के दाम बढ़ेंगे और ऐसे में 2023 की स्थिति और खराब रहने वाली है।

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