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नेपाली जनता ने नकारा तो ‘जहर’ बोने में जुटे केपी ओली, पीएम देउबा के गठबंधन को तोड़ने की तैयारी

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काठमांडू

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को ताजा आम चुनाव परिणामों में मतदाताओं ने खारिज कर दिया है। ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल ने चुनाव में 78 सीटें जीती हैं। वहीं प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की पार्टी नेपाली कांग्रेस 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इससे पहले पिछले चुनाव में ओली की यूएमएल सबसे बड़ी पार्टी थी। इस करारी हार के बाद ओली और उनकी पार्टी यह दावा कर रही है कि वह विपक्ष में बैठेगी लेकिन पर्दे के पीछे से वह नेपाली कांग्रेस के 5 दलों के गठबंधन में जहर के बीज बोने जा रही है।

नेपाली अखबार काठमांडू पोस्‍ट की रिपोर्ट के मुताबिक ओली की कोशिश है कि किसी तरह से गठबंधन में सिर फुटव्‍वल हो और उन्‍हें अगले 5 साल तक विपक्ष में न रहना पड़े। वहीं यूएमएल के कुछ नेताओं का कहना है कि फिलहाल इस 5 दलों वाले गठबंधन को तोड़ना आसान नहीं है। माना जा रहा है कि इसी वजह से यूएमएल खुद को एक मजबूत विपक्षी दल के रूप में पेश कर सकती है ताकि सत्‍ता में काब‍िज गठबंधन को भविष्‍य में तोड़ा जा सके। यूएमएल के नेता सुरेंद्र पांडे ने कहा, ‘देउबा फिलहाल एक गठबंधन बनाने में कामयाब हो गए हैं ताकि वह नई सरकार का नेतृत्‍व कर सकें।’

प्रचंड की पार्टी पर नजरें गड़ाए बैठे हैं केपी ओली
ओली की पार्टी के नेता सुरेंद्र पांडे ने कहा कि उनकी पार्टी सरकार बनाने का दावा नहीं करेगी। पांडे भले ही दावा करें लेकिन उनकी ही पार्टी के कई वरिष्‍ठ नेता पुष्‍प कमल दहल प्रचंड की पार्टी सीपीएन माओवादी सेंटर और नेपाली कांग्रेस में अपने समकक्षों के साथ लगातार बैठकें कर रह रहे हैं और विचार विमर्श कर रहे हैं। यूएमएल के सूत्रों ने बताया कि पार्टी के उपाध्‍यक्ष विष्‍णु पौडयाल, महासचिव शंकर पोखरेल और अन्‍य नेता प्रचंड की पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ विचार विमर्श कर रहे हैं।

यूएमएल सेंट्रल कमिटी के एक सदस्‍य ने कहा, ‘अभी मैं बहुत ज्‍यादा खुलासा नहीं कर सकता हूं लेकिन हमारी पार्टी नेपाली कांग्रेस के नेतृत्‍व वाले गठबंधन को नई सरकार बनाने से रोकने के लिए काम कर रही है। लेकिन अगर प्रचंड की पार्टी को गठबंधन से नहीं निकाला गया तो हम विभिन्‍न पदों पर अपने लोगों को नहीं बैठा सकेंगे और कम से कम एक साल तक तो सत्‍ता से बाहर रहना होगा।’ वहीं ओली के करीबी और चुनाव में हार का सामना करने वाले कई नेताओं का कहना है कि उन्‍हें कम से कम 1 या 2 साल के लिए सत्‍ता से बाहर रहना चाहिए। उन्‍हें भरोसा है कि नई सरकार लंबे समय तक नहीं चलेगी।

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