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Thursday, March 12, 2026
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DM मेरठ में करुणा की कमी! जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगा दी फटकार, सब सरकारी अफसरों को याद दिला दिया काम

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मेरठ:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसिड अटैक पीड़िता को मुआवजा देने में लापरवाही बरतने पर डीएम मेरठ की आलोचना की है। कहा, यह उनकी अक्षमता है और उनमें करुणा की कमी दर्शाता है। कोर्ट ने भविष्य में एसिड अटैक पीड़िता को मुआवजे के भुगतान में देरी न हो, इसके लिए प्रमुख सचिव, गृह को सभी जिलाधिकारियों को इस आशय का सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया।

जस्टिस शेखर बी सराफ तथा जस्टिस विपिन चंद्र दीक्षित की बेंच ने ये भी कहा, ‘अधिकारियों का प्राथमिक दायित्व है कि वे लोगों को सेवा प्रदान करें। डीएम ने भारत सरकार के स्पष्ट निर्देश के बावजूद पीड़िता को एक लाख रुपये अतिरिक्त मुआवजे का भुगतान नहीं किया।’

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेरठ के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को एसिड अटैक सर्वाइवर को मुआवजा देने में देरी के लिए कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने डीएम के रवैये को “करुणा की कमी” करार देते हुए एक सप्ताह के भीतर आवश्यक दस्तावेज केंद्र सरकार को भेजने का निर्देश दिया, ताकि मुआवजा जल्द से जल्द जारी किया जा सके। कोर्ट ने आदेश दिया कि छह सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को अतिरिक्त मुआवजा प्रदान किया जाए।

एक लाख के मुआवजे के लिए भटक रही थी याचिकाकर्ता
यह मामला रजनीता नामक महिला द्वारा दायर रिट याचिका से संबंधित है, जिसने अदालत को बताया कि वह 2013 से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष के तहत मिलने वाले 1 लाख रुपये के अतिरिक्त मुआवजे के लिए भटक रही है। याचिकाकर्ता के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सितंबर 2024 में मेरठ के डीएम को दो एसिड अटैक सर्वाइवर्स के संबंध में आवश्यक जानकारी भेजने के निर्देश दिए थे, लेकिन डीएम ने कोई जवाब नहीं दिया।

न्यायमूर्ति ने सभी जिलाधिकारियों को दिए निर्देश
खंडपीठ ने राज्य सरकार को सभी जिलाधिकारियों को परिपत्र जारी करने का निर्देश दिया ताकि भविष्य में इस तरह की लापरवाही न हो। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति विपिन चंद्र दीक्षित की पीठ ने डीएम के “उदासीन” रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई।

‘सरकारी अधिकारियों का प्राथमिक कर्तव्य जनता की सेवा करना’
उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारियों का प्राथमिक कर्तव्य जनता की सेवा करना है, विशेष रूप से उन लोगों की जो हिंसा के गंभीर कृत्यों के कारण पीड़ित हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिए और पीड़ितों को त्वरित न्याय सुनिश्चित करना चाहिए। इस मामले में न्यायालय ने डीएम को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे तत्काल प्रभाव से आवश्यक कार्रवाई करें, ताकि पीड़िता को जल्द से जल्द न्याय मिल सके।

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