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Friday, March 13, 2026
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OPINION: शरद पवार ने तब गुगली फेंकी, अब ‘दूसरा’ डाला है

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मुंबई

शरद पवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं। इसलिए महाराष्ट्र की राजनीति में जो कुछ हो रहा है उसे 82 साल के घाघ नेता की हार मान लेना जल्दबाजी होगी। पता चला शरद पवार विजेता हैं। कुछ चालें ऐसी होती हैं जिनकी परतें खुलने में वर्षों लग जाते हैं। तब जाकर सच्चाई का पता चलता है। शरद गोविंद राव पवार अपने पास कई मोहरे रखते हैं। अजित पवार उन्हीं में से एक हैं। एक भरोसामंद मोहरा जिसने 23 नवंबर 2019 की सुबह चौंका दिया था। तब भतीजे पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ डेप्युटी सीएम की शपथ ले ली थी। विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया था। रार सीएम पोस्ट को लेकर था। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर ताल ठोक रही थी तो उद्धव ठाकरे का दावा था कि चुनाव से पहले अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि सीएम पोस्ट शिवसेना के पास रहेगा। उस दिन से लेकर कल यानी दो जुलाई, 2023 के बीच अजित पवार तीन पार डिप्टी सीएम बन चुके हैं। अलग-अलग सीएम के साथ। पहली बार वाला दांव तो 72 घंटे भी नहीं टिक सका। दूसरा दांव महाविकास अघाड़ी में उद्धव के डेप्युटी के तौर पर पिछले साल 29 जून तक चला। ये पारी शिवसेना में आए सियासी जलजले ने खत्म कर दिया। एकनाथ शिंदे 35 विधायकों के साथ फडणवीस की शरण में गए और सीएम बन गए। अब अजीत पवार ने उनके डेप्युटी के तौर पर भी शपथ ले ली है। यही राजनीति की लीला है।

शरद पवार की चाल
जब अजित पवार पहली बार कथित तौर पर बागी हुए तो क्या हुआ? शरद पवार की डोर से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) जुड़ी रही। बगावत नहीं हुई। अजित पवार को लौटना पड़ा। शरद पवार बतौर चाणक्य और मजबूत हुए। क्या ये सब इतना ही सरल था जितना दिखा? दगाबाज भतीजे को कौन कुछ ही घंटों बाद गले लगाएगा और अघाड़ी की सरकार में डेप्युटी सीएम बनवाएगा? लेकिन उस समय तो माहौल ऐसा बना जैसे अजित पवार नौसिखिया हों और चाल चलने में मात खा गए हों। खुलासा तो अब जाकर हुआ है। कुछ दिनों पहले देवेंद्र फडणवीस ने पोल खोल कार्यक्रम शुरू किया। उनका दावा है कि 2019 में एनीसीपी सुप्रीमो भाजपा के साथ आने के लिए तैयार थे। लेकिन मराठा नेता ने डबल गेम खेल दिया। पहले तो शरद पवार ने पल्ला झाड़ा फिर खुलासा किया। शरद पवार ने कहा कि अजित पवार को डेप्युटी सीएम बनाकर उन्होंने गुगली फेंकी थी। मकसद था भाजपा को क्लीन बोल्ड करना। और वो कामयाब हो गए। तो क्या पता इस बार ‘दूसरा’ फेका हो? इसके संकेत मिलने तो शुरू हो गए गए हैं। जरा इन चार बातों पर गौर कीजिएगा

1. एनसीपी के 53 विधायक हैं। अजित पवार के साथ आठ विधायकों ने शपथ ली। मतलब कुल मिलाकर नौ विधायक अजित पवार के साथ सरकार में शामिल हुए हैं। लेकिन अलग गुट के तौर पर मान्यता के लिए कम से कम 36 विधायकों को तोड़ना होगा। ये संख्या तो अजित पवार के साथ दिखाई नहीं दे रही। शपथ ग्रहण में एनसीपी के एमपी अनमोल कोल्हे मौजूद थे लेकिन कुछ ही घंटों बाद शरद पवार के घर चले गए।

2.शरद पवार ने भतीजे के कारनामें को रिबेलियन नहीं रॉबरी या डकैती करार दिया। अब ये बताइए कि आपके घर में डकैती हो लेकिन डकैत के खिलाफ आप एफआईआर नहीं लिखाना चाहें तो से क्या कहा जाए। वो भी तब जब डकैतों की पहचान हो चुकी है। लेकिन शरद पवार यही कर रहे हैं। बागियों के घेरने के बदले पवार ने कहा कि वो जनता के बीच जाएंगे। कोई कानूनी कार्रवाई नहीं करेंगे।

3. शरद पवार ने कहा कि अगर कोई गुट एनसीपी पर दावा ठोकता है तब भी उन्हें कोई गुरेज नहीं है। उनके मुताबिक जनता जनार्दन तय कर देगी कि एनसीपी किस नेता की है। हैरानी होती है इस बयान पर। खास कर शिवसेना के बागियों पर अयोग्य ठहराए जाने की तलवार लटक रही हो तब इस तरह का बयान चौंकाने वाला है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने उद्धव ठाकरे की याचिका पर जो ऐतिहासिक फैसला सुनाया उससे पवार को तो पावर मिलना चाहिए था। फिर सरेंडर का भाव क्यों है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक दल और विधायक दल अलग-अलग हैं और वरीयता पार्टी को मिलेगी न कि कुछ विधायकों के मिलकर लिए गए फैसले को। लेकिन शरद पवार संतुष्ट हैं। इसलिए हमें शक है।

4.और तो और जिन नेताओं के साथ मिलकर अजित पवार ने पाला बदलने का फैसला किया उस मीटिंग में सुप्रिया सुले भी मौजूद थीं। खबरों के मुताबिक वो मीटिंग बीच में छोड़ कर चली गईं। तो क्या उनको भनक लग गई थी और हां तो फिर चाणक्य के लिए डकैती रोकना बेहद आसान था। उन्होंने कोई फैसला नहीं लिया।

वैसे पांचवां कारण भी है जिससे शक पैदा होता है कि चाणक्य ने गुगली के बाद दूसरा फेका है लेकिन हमारी राजनीति का दलदल इतना गहरा है कि खुद पर ही यकीन नहीं होता। प्रफुल्ल पटेल जैसे बिना जन समर्थन वाले कद्दावर नेता शरद पवार को छोड़ गए हैं या शरद पवार के लिए गए हैं, यही सोच रहा हूं। दोनों के सही होने की संभावना 99 प्रतिशत है। छगन भुजबल भी बिना विभाग के मंत्री बनने वालों की लिस्ट में हैं। पिछले हफ्ते महाराष्ट्र टाइम्स के कार्यक्रम में आए थे। उन्होंने दावा किया कि अजित पवार में शरद पवार को चुनौती देने की कुव्वत नहीं हैं। हफ्ते भर बाद ही दोनों कहां हैं आप हम जानते हैं। एक और बात पूरे एनसीपी के कथित संकट पर शक पैदा करती है। जब शरद पवार ने सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया तो अजित पवार द्रवित हो गए थे। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर खुद को नेता प्रतिपक्ष से हटाकर संगठन में लाने की भावुक अपील की थी। मतलब वो प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते थे। क्या पता चाचा ने नेता प्रतिपक्ष से सीधे डेप्युटी सीएम बनाने का इंतजाम कर दिया हो। ध्यान रखिए कि लोकसभा चुनाव 2024 पास होकर भी दूर है। और राजनीति के चाणक्य इसी कालखंड में प्रमुख प्रयोग करते हैं।

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