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जातिसूचक शब्दों को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, इन शब्दों का इस्तेमाल पर नहीं माना जाएगा दोषी

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नई दिल्ली

जातिसूचक शब्दों को लेकर होने वाले विवाद पर अब राजस्थान हाई कोर्ट का एक बड़ा फैसला आया है। हाई कोर्ट की जोधपुर बेंच ने कई शब्दों को लेकर फैसला दिया है कि अगर कोई इस तरह के शब्द बोलता है तो उसे एससी एसटी एक्ट के तहत दोषी नहीं मान जा सकेगा। इन शब्दों की बात करें तो इसमें ‘भंगी’, ‘नीच’, ‘भिखारी’ और ‘मंगनी’ आदि हैं।

दरअसल, राजस्थान हाई कोर्ट के जोधपुर बेंच ने भंगी’, ‘नीच’, ‘भिखारी’ और ‘मंगनी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने वाले चार लोगों के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों को हटा दिया, और कहा कि ये जातिसूचक शब्द नहीं हैं और ना ही ऐसा कोई आरोप था कि चारों व्यक्ति उनकी जाति को पहले से जानते हों।

आरोपियों के खिलाफ अब कौन सा चलेगा केस?
अदालती कार्रवाई कवर करने वाली वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट बताती है कि कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपियों पर लोकसेवकों के काम बाधा डालने का मामला चलाया जाएगा। न्यायमूर्ति बीरेंद्र कुमार की सिंगल बेंच ने चार अपीलकर्ताओं द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई की थी। इसमें एससी/एसटी अधिनियम के तहत उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को चुनौती दी गई थी। दरअसल अतिक्रमण हटाने गई एक टीम पर गलत पैमाइश का आरोप लगाते हुए युवकों ने इस तरह की टिप्पणी की थी।

बचाव में क्या बोले आरोपी?
इस मामले में कोर्ट में अपील करने वालों का तर्क था कि उन्हें उन लोगों (एक मुखबिर और अन्य) की जाति के बारे में जानकारी नहीं थी और इसका कोई सबूत भी नहीं था। अपीलकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के अलावा कोई और गवाह भी नहीं था। यह घटना सार्वजनिक रूप से घटित भी नहीं हुई थी।

कोर्ट ने क्यों दिया ये फैसला?
इसके अलावा अपीलकर्ताओं की तरफ से यह तर्क दिया गया कि गालियां अपमानित करने के इरादे से नहीं बल्कि जमीन के अनुचित माप के लिए दी गई थीं, जिनका उपयोग अपीलकर्ताओं द्वारा कथित तौर पर किए गए अतिक्रमण का फैसला करने के लिए किया गया था। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जैसा कि ऊपर बताया गया है, मामले में इस्तेमाल किए गए शब्द जातिसूचक नहीं थे और न ही ऐसा आरोप है कि याचिकाकर्ता उन लोक सेवकों की जाति को जानते थे, जो अतिक्रमण हटाने गए थे।

इसके अलावा यह आरोप को ध्यान से देखने पर यह बिल्कुल स्पष्ट है कि याचिकाकर्ताओं का इरादा, व्यक्तियों को इस कारण से अपमानित करने का नहीं था कि वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्य थे, बल्कि याचिकाकर्ताओं का कृत्य लोकसेवकों द्वारा गलत तरीके से की गई माप की कार्रवाई के विरोध में था।

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