नई दिल्ली
दिल्ली में एक अध्यादेश ने सियासत में उबाल ला रखा है। जब से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए केंद्र ने ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर अपना अध्यादेश जारी किया है, केजरीवाल सरकार आग बबूला है और इसे लोकतंत्र की हत्या बता रही है। लेकिन अभी तक ये अध्यादेश कानून नहीं बना है, इसे दोनों सदनों में लाया जाएगा- लोकसभा और राज्यसभा।
अब लोकसभा में तो एनडीए आसानी से इस बिल को पारित करवा देगी, लेकिन सारा खेल राज्यसभा में शुरू होगा जहां पर सरकार के पास अभी बहुमत नहीं है। ऐसे में सीएम अरविंद केजरीवाल जरूर चाहेंगे कि सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर उनका समर्थन करे जिससे ये अध्यादेश पारित ना हो पाए। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या वर्तमान में ऐसा हो सकता है? असल में राज्यसभा में एनडीए के पास बहुमत तो नहीं है, लेकिन कई ऐसे दल हैं जिन्होंने समय-समय पार्टी के पक्ष में वोट डाला है और विपक्ष से भी उतनी ही दूरी बना रखी है। ऐसे में केजरीवाल की ये राह आसान तो नहीं रहने वाली है, लेकिन राज्यसभा का ये नंबर गेम समझना जरूरी हो जाता है।
राज्यसभा में इस समय कुल 238 सदस्य हैं और बहुमत का आंकड़ा 120 चल रहा है। इस समय ना एनडीए ना यूपीए, किसी के पास भी बहुमत वाला आंकड़ा नहीं है। लेकिन एनडीए सबसे बड़ा दल जरूर है, उसके पास अपने 110 सदस्य हैं, उसमें पांच नामित सदस्य भी शामिल हैं। इसी तरह अभी यूपीए के पास 64 और आम आदमी पार्टी जैसे दूसरे कई दलों के पास कुल 64 सदस्य हैं। अब बड़ी बात ये है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आम आदमी पार्टी के पक्ष में एक बड़ी पहल कर दी है। उन्होंने कांग्रेस का समर्थन आप को दिलवा दिया है, यानी कि देश की सबसे पुरानी पार्टी एक कई साल पुराने विवाद को लेकर अब केजरीवाल का समर्थन करने वाली है।
लेकिन अकेले यूपीए के समर्थन से राज्यसभा में आप की नैया पार नहीं लगने वाली है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि इस समय राज्यसभा में टीएमसी के पास 12, आप पर10, बीजेडी के पास 9, वाईएसआर पर 9, बीआरएस के 7 लेफ्ट पार्टी के 7, सपा के 3, बसपा का 1, जेडीएस का 1 और अन्य के 5 शामिल हैं। यहां अब ममता से लेकर लेफ्ट तक, अखिलेश से लेकर मायावती तक एक बार के लिए केजरीवाल के साथ जा सकते हैं, लेकिन बीजेडी और वाईएसआर पर भरोसा नहीं किया जा सकता। एक तरफ नवीन पटनायक विपक्षी एकता से खुद को दूर रख रहे हैं तो वहीं कई अहम बिलों पर वाईएसआर ने या तो एनडीए का समर्थन किया है या फिर उसने वॉकआउट का रास्ता चुना। दोनों ही फैसलों में सीधा फायदा एनडीए को पहुंचा है।
ऐसे में अगर अभी बीजेडी और वाईएसआर के समर्थन को हटा दिया जाए तो AAP को सबसे अनुकूल स्थिति में कुल 98 सदस्यों का समर्थन मिल सकता है। लेकिन ये आंकड़ा 120 से काफी कम है, ये तभी पूरा हो सकता है अगर बीजेडी के 9 और वाईएसआर के भी 9 सदस्य AAP के पक्ष में ही वोट डालें। अगर उन्होंने वॉकआउट कर दिया, तो उस स्थिति में राज्यसभा में बहुमत का आंकड़ा उतना ही कम हो जाएगा, यानी कि एनडीए का रास्ता पूरी तरह साफ और अध्यादेश कानून बन जाएगा।
अब नीतीश कुमार ने बातचीत कर कांग्रेस को तो मना लिया है, खुद अरविंद केजरीवाल बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, एनसीपी प्रमुख शरद पवार और पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे से मुलाकात करने वाले हैं। इस समय एक विवाद के अंदर आम आदमी पार्टी को दो अवसर दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ जरूरी समर्थन से अध्यादेश को कानून बनने से रोकना है, तो दूसरी तरफ 2024 से पहले वाली विपक्षी एकता में AAP भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा सकती है।
असल में नीतीश कुमार जिस विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं, उसमें आम आदमी पार्टी को भी वे साथ लेकर चल रहे हैं। ये अलग बात है कि खुद आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने इस पर कुछ भी खुलकर नहीं बोला है। लेकिन मुद्दों को लेकर आपसी सहमति बनने लगी है, ऐसे में आने वाले दिनों में इस दिशा में कोई बड़ा कदम भी उठाया जा सकता है।
वैसे जिस अध्यादेश को लेकर सारा बवाल चल रहा है, उसके बारे में जानना भी जरूरी है। असल में कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ट्रांसफर-पोस्टिंग की ताकत दिल्ली सरकार के हाथों में दी थी। तर्क दिया गया था कि जो अधिकारी काम नहीं करते, उनकी जवाबदेही तय होना जरूरी है। ऐसे में उनके ट्रांसफर हक दिल्ली सरकार के पास गया था। लेकिन केंद्र सरकार को ये मंजूर नहीं हुआ, ऐसे में कोर्ट के आदेश के कुछ दिन बाद ही एक अध्यादेश ला दिया गया। उसके तहत अधिकारियों की पोस्टिंग को लेकर फिर असल बॉस एलजी को बना दिया गया। ऐसे में सारी विवाद की जड़ यही है और अब लड़ाई राज्यसभा के नंबर गेम तक आ गई है।
