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रूस जमकर कर रहा इस्तेमाल… ड्रोन अटैक के खतरों से निपटने के लिए कितना तैयार है भारत?

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नई दिल्ली

रूस के सारातोव शहर से आई तस्वीरों ने सबको अमेरिका पर हुए 9/11 अटैक की याद दिला दी। यूक्रेन ने रूस के इस शहर की ऊंची बिल्डिंग पर ड्रोन से हमला किया। ड्रोन इस इमारत पर जा टकराया जिसके बाद सब धुंआ धुंआ हो गया। रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन का खूब इस्तेमाल दिख रहा है। यह इस्तेमाल दोनों तरफ से हो रहा है। ड्रोन का खतरा सभी देशों की सेनाओं के लिए चुनौती बना रहा है। भारत ने भी इस खतरे से निपटने के लिए अपनी तैयारी बढ़ाई है और कैपेबिलिटी बढ़ाने के लिए कई नए सिस्टम लेने पर काम कर रहा है।

ड्रोन छोटा लेकिन खतरा बढ़ा
मानवरहित एरियल सिस्टम (UAS) दो तरह के होते हैं। एक यूएवी जो साइज में किसी एयरक्राफ्ट की तरह ही होते हैं। और दूसरे ड्रोन कटैगरी के, जो साइज में छोटे होंते हैं। जो बड़े यूएवी हैं उन्हें डिटेक्ट करना आसान है क्योंकि इनके लिए वही सिस्टम काम आ जाता है जो किसी एयरक्राफ्ट को डिटेक्ट करने के लिए होता है साथ ही एयर डिफेंस का वही तरीका इन्हें नष्ट करने के लिए होता है जो एयरक्राफ्ट के लिए है। लेकिन ड्रोन साइज में छोटे होते हैं और अब ड्रोन कई तरह के हो गए है। इसमें कामिकाजी ड्रोन से लेकर स्वॉर्म ड्रोन तक हैं। यह कम ऊंचाई में उड़ान भरते हैं इसलिए ड्रोन को डिटेक्ट करने के साथ ही उन्हें नष्ट करना एक चुनौती है। अगर स्वॉर्म ड्रोन हों तो चुनौती और बढ़ जाती है क्योंकि स्वॉर्म ड्रोन बहुत सारे ड्रोन्स का झुंड होता है।

कैसे निपटते हैं ड्रोन के खतरे से
भारतीय सेना के एक अधिकारी के मुताबिक दुश्मन के ड्रोन से निपटने के दो तरीके हैं। सॉफ्ट किल और हार्ड किल। हार्ड किल मतलब उसे पूरा नष्ट करना जबकि सॉफ्ट किल में उसके सिस्टम को जाम किया जाता है या गड़बड़ाया जाता है। हालांकि सॉफ्ट किल की अपनी सीमाएं हैं क्योंकि ड्रोन को जाम करने के लिए पूरे बैंडव्रिथ को जाम नहीं कर सकते और उसकी सटीक फ्रिक्वेंसी का पता नहीं चल पाता। साथ ही अगर स्वॉर्म ड्रोन है यानी ड्रोन का पूरा झुंड तो सॉफ्ट किल कैपेबिलिटी ऐसी नहीं होती है कि वह एक साथ सभी ड्रोन को जाम कर दे। अगर बैंड इनक्रिप्टेड है तो ये और भी मुश्किल हो जाता है।

क्या इस्तेमाल कर रहे हैं रूस, यूक्रेन
जानकारों के मुताबिक रूस और यूक्रेन एक दूसरे के ड्रोन के खतरे से निपटने के लिए सॉफ्ट किल और हार्ड किल दोनों का कॉम्बिनेशन इस्तेमाल कर रहे हैं। सॉफ्ट किल टेंपरेरी होता है इसलिए दोनों का कॉम्बिनेशन ही सटीक रणनीति मानी जाती है। दुनिया भर में अभी ड्रोन से निपटने के लिए यानी हार्ड किल के लिए पांच तरह के सिस्टम हैं। पहला लेजर वेपन सिस्टम। दूसरा हाईपावर माइक्रोवेब गन्स, तीसरा ड्रोन किल सिस्टम यानी ड्रोन से ही ड्रोन को मार गिराया जाए, चौथा एंटी ड्रोन गन्स और पांचवा VMCDS यानी वीइकल माउंटेड काउंटर ड्रोन सिस्टम। इस सिस्टम से छोटे छोटे रॉकेट फायर होते हैं और यह स्वॉर्म ड्रोन (ड्रोन का पूरा झुंड) से निपटने में इफेक्टिव होते हैं।

भारत बढ़ा रहा है अपनी क्षमता
भारतीय सेना के पास ड्रोन के खतरे से निपटने के लिए सॉफ्ट किल सिस्टम है, इन्हें इमरजेंसी प्रॉक्योरमेंट के तहत लिया गया था। सेना के पास ड्रोन जैमिंग सिस्टम हैं जो 10 किलोमीटर का तक ड्रोन को डिटेक्ट कर जाम कर सकते हैं। सेना के पास लो लेवल लाइट वेट रडार हैं जो कम ऊंचाई पर उड़ रहे ड्रोन को डिटेक्ट कर सकते हैं। सेना अब अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए एंटी ड्रोन्स गन्स भी ले रही है साथ ही इसके लिए स्मार्ट एम्युनिशन लेने की प्रकिया भी शुरू की गई है। सेना ने एंटी ड्रोन हाईपावर माइक्रोवेब सिस्टम के लिए रिक्वेस्ट फॉर इंफॉर्मेशन (RFI) जारी किया है।

लेजर वेपन सिस्टम की तलाश
सेना ऐसे सिस्टम की तलाश में है जिसकी रेंज पांच किलोमीटर हो और जो छोटे ड्रोन और स्वॉर्म ड्रोन से निपटने में सक्षम हो। लेजर वेपन सिस्टम लेने कि लिए भी सेना प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है। सेना के पास अभी लो लेवल लाइट वेट रडार हैं लेकिन सेना अब इन्हें बड़ी संख्या में लेने की तैयारी कर रही है। सेना ऐसा ऑप्शन भी देख रही है जो हार्ड किल और सॉफ्ट किल दोनों को कॉम्बिनेशन हो। जानकारों का कहना है कि भारत को अपने पड़ोसी देशों की तैयारियों पर भी नजर रखनी होगी। टर्की ने हाई पावर माइक्रोवेब सिस्टम डिवेलप किया है और यह आने वाले वक्त में पाकिस्तान के पास आ ही जाएगा।

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