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कॉम्पिटिशन का दौर और आगे बढ़ने की चाहत… इस भागदौड़ में हंसना भूल गया भारत?

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नई दिल्ली,

‘बात-बात पर मुस्कुराता है ये आदमी, किसी छोटे शहर से आया हुआ लगता है’
बॉलीवुड एक्टर आयुष्मान खुराना ने अपने सोशल मीडिया पर ये पंक्तियां आज से करीब 5 साल पहले शेयर की थीं. लेकिन अगर सोचेंगे तो आज भी इसके मायने बदले नहीं हैं. एक पल के लिए अपने आस-पास बैठे लोगों पर नजर दौड़ाइए. आप पाएंगे कि शहरों की भागती-दौड़ती जिंदगी ने लोगों के चेहरों से हंसी लगभग गायब सी कर दी है. सुबह उठकर घर से दफ्तर औऱ फिर शाम को दफ्तर से घर की दूरी तय करने में ही जिंदगी खत्म होती जा रही है. लोगों के पास मुस्कुराना तो छोड़िए, ढंग से सांस तक लेने की फुरसत नहीं बची है.

यूएन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क (UN Sustainable Development Solutions Network) द्वारा जारी की जाने वाली World Happiness Report पर अगर गौर करें तो साल 2023 में 137 देशों में भारत का स्थान 125वां है. ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट’ सर्वे के डेटा के आधार पर तैयार होती है. इसमें हर देश के लोगों से कुछ सवाल पूछे जाते हैं, जिनकी रैंकिंग 0 से 10 के बीच करनी होती है. जवाबों के आधार पर ही ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ में किसी देश की रैंकिंग तय होती है.

ऐसा नहीं है कि भारत सिर्फ 2023 में ही हैप्पीनेस इंडेक्स में पिछड़ा है. 2022 में भारत की रैंकिंग 136, 2021 में 139, 2020 में 144 और 2019 में 140 थी. देशों के खुशी का पैमाना नापने वाली इस रिपोर्ट में फिनलैंड पिछले 6 साल से शीर्ष पर है. सोचने वाली बात है कि आखिर क्यों पिछले कई सालों से फिनलैंड इस सूची में शीर्ष पर कायम है और हम अंतिम के कुछ देशों में?

हमारी जिंदगी में हंसना कितना जरूरी है?
साइंस की मानें तो कोई बच्चा अपने जन्म के तीन महीने बाद हंसना सीख जाता है. लेकिन ये हंसी उम्र बढ़ने के साथ-साथ कहां गायब हो जाती है? Amity University के व्यवहार एवं सम्बद्ध विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. फातिमा शाहनवाज कहती हैं कि ‘बच्चा हमेशा अपने आस-पास के माहौल को देखकर बड़ा होता है. ये दौर कॉम्पिटिशन का है, ऐसे में किसी भी इंसान को स्ट्रेस या डिप्रेशन होना आम बात है. जब हम कुछ अचीव करते हैं या अगर किसी काम का रिजल्ट हमें अपनी उम्मीद के मुताबिक मिलता है तो शरीर में डोपामाइन नाम का केमिकल रिलीज होता है. ये डोपामाइन ही हमें अंदर से अच्छा महसूस कराता है.’

विज्ञान कहता है कि डोपामाइन ही वो केमिकल है जो खुशी के लिए जिम्मेदार है. लेकिन इस डोपामाइन को रिलीज करें कैसे? क्योंकि असल समस्या तो यही है कि अपने स्ट्रेस को दूर कैसे करना है, ये हमें नहीं पता होता. क्या सिर्फ टीवी और यूट्यूब पर कॉमेडी शोज देख लेने भर से स्ट्रेस दूर हो सकता है? डॉ. फातिमा के मुताबिक ‘स्ट्रेस को दूर करने के लिए लाफ्टर थेरेपी एक कारगर उपाय है. कई डॉक्टर तनाव से जूझ रहे लोगों को इसकी सलाह देते हैं.’

कैसे हुई World Laughter Day की शुरूआत?
अपने इलाके के पार्कों में कुछ लोगों के समूह को आपने जोर-जोर से हंसते तो जरूर देखा होगा. ये भी एक तरह की लाफ्टर थेरेपी ही है. ये बात सौ टका प्रमाणित है कि हंसने से स्ट्रेस कम होता है. किसी ग्रुप में बैठे होने पर इंसान के हंसने की संभवना 30 गुना बढ़ जाती है. आज से कई साल पहले लगभग इसी तर्ज पर Laughter Day की शुरुआत हुई जो अब पूरे विश्व में मनाया जाता है.

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि World Laughter Day की शुरुआत भारत से ही हुई. पहली बार 10 मई 1998 को मुंबई में सेलिब्रेट किया गया. अब यह दिन मई महीने के पहले रविवार को पूरे विश्व में मनाया जाता है. इसका श्रेय लाफ्टर योगा मूवमेंट (Laughter Yoga movement) के संस्थापक डॉ. मदन कटारिया को जाता है. डॉ. कटारिया पेशे से फैमिली फिजिशियन हैं.

डॉ. मदन कटारिया बताते हैं कि ‘हमारी इच्छा थी कि World Laughter Day जनवरी महीने में मनाया जाए ताकि साल की शुरुआत हंसते हुए हो. लेकिन कई देशों में जनवरी में जबरदस्त बर्फ पड़ती है, जिसके कारण यह संभव नहीं हो सका. अंत में हमने इसे मई महीने के पहले रविवार को मनाने का फैसला किया.’

डॉ. कटारिया कहते हैं कि ‘दिमाग को नहीं पता होता कि आपको सच में हंसी आ रही है या आप नकली हंसी हंस रहे हैं. इसका फायदा आप रोजमर्रा के स्ट्रेस को दूर करने में उठा सकते हैं. इस प्रोसेस को लोगों के लिए दिलचस्प बनाने के लिए हमने कई प्रयोग किए और हंसने की कई एक्सरसाइज ईजाद की. नमस्ते लाफ्टर, मोबाइल लाफ्टर कुछ ऐसी ही एक्सरसाइज हैं.’

खिलखिलाकर हंसने से दूर हो सकती हैं बीमारियां?
आज भारत, अमेरिका, जर्मनी समेत पूरे विश्व में डॉ. मदन कटारिया अपने लाफ्टर क्लब का संचालन कर रहे हैं जिसका काम लोगों को हंसाते हुए उनका स्ट्रेस दूर करना है. इस क्लब का मेंबर कोई भी बन सकता है और ये पूरी तरह फ्री है. नोएडा में रहने वाली इस क्लब की मेंबर रंजना मल्होत्रा बताती हैं कि ‘उनके पति को 5 साल पहले ब्रेन स्ट्रोक आया था, जिसके बाद लंबे समय तक दवा लेनी पड़ी. लेकिन लाफ्टर योगा से काफी फायदा मिला और दवा पर निर्भरता भी लगभग खत्म हो गई है.’

खोजने निकलेंगे तो आपको कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनकी गंभीर बीमारियों का इलाज खिलखिलाकर हंसने से हो गया. वो कहते हैं ना कि ‘पहला सुख निरोगी काया’ और निरोगी रहने के लिए हंसना उतना ही जरूरी है जितना जिंदा रहने के लिए सांसे. इसलिए अपनी व्यस्त जिंदगी में से दो पल मुस्कुराने के लिए जरूर चुरा लीजिए.

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