प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ में 29 जनवरी को भगदड़ हुई थी। सरकारी आंकड़ों में भगदड़ में 30 लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे। इसके बाद से ही विपक्ष के नेताओं की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि कुंभ में वीआईपी कल्चर है। विपक्ष का आरोप है कि वीआईपी लोगों के लिए कुंभ में शानदार इंतजाम किए गए हैं जबकि आम लोगों को तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
कांग्रेस भी इस वीआईपी कल्चर को उठाने के मामले में काफी मुखर रही है। लेकिन यह जानना बहुत जरूरी होगा कि 1954 में भी कुंभ मेले में भयानक भगदड़ हुई थी और तब इसमें लगभग 800 लोग मारे गए थे। उस वक्त देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे और यह आजादी के बाद देश का पहला कुंभ था।
वीआईपी कल्चर की आलोचना
तब भगदड़ में हुई मौतों को लेकर गांधीवादी नेता और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जेबी कृपलानी ने संसद में वीआईपी कल्चर के मुद्दे को उठाया था। उन्होंने तत्कालीन नेहरू सरकार के वीआईपी कल्चर की आलोचना की थी और कहा था कि केवल धार्मिक कर्मकांड करने से ही हमें हमारे पापों से मुक्ति नहीं मिलेगी। यह भी काबिलेगौर है कि उस दौरान केंद्र और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की ही सरकार थी।
लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान जेबी कृपलानी ने कहा था, ‘कुंभ में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर दुख व्यक्त करना ही काफी नहीं है। अगर हम भविष्य में इस तरह की घटनाओं से बचना चाहते हैं तो यह जरूरी है कि हम खुद को गलतियों से मुक्त रखें। हमें पता लगाना होगा कि आखिर हमने गलती कहां की है?’
जेबी कृपलानी ने यह भी कहा था कि किस तरह कांग्रेस के नेताओं ने आजादी के बाद अपना दृष्टिकोण बदल दिया है। कृपलानी ने कहा था कि एक बार गांधी जी हरिद्वार के कुंभ मेले में आए थे। उनके साथियों ने कभी नहीं सोचा होगा कि गंगा में डुबकी लगाने से उनके पाप धुल जाएंगे और वे पवित्र हो जाएंगे?
कृपलानी ने कहा था, ‘इससे पहले कभी भी कुंभ के मेले जैसे आयोजनों का प्रचार नहीं हुआ लेकिन हम लोग ऐसा कर रहे हैं। हमने मेले का प्रचार किया, लोगों को बुलाया और उन्हें भरोसा दिलाया कि यहां पर सारी सुविधाएं हैं लेकिन हमसे पहले के लोगों ने कभी ऐसा नहीं किया।’
हर समय सत्ता को मजबूत करना जरूरी नहीं
कृपलानी ने कहा था कि राज्यपाल साधु-संतों के शिविरों में गए थे। साधु-संतों ने कांग्रेस सरकारों का समर्थन करते हुए प्रस्ताव पारित किया जबकि हर समय सत्ता को मजबूत करना जरूरी नहीं है। ब्रिटिश शासन के दौरान इन्हीं साधु-संतों ने विदेशी सरकार के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया था।
