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अजन्मे बच्चे या भ्रूण का कोई अधिकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट में ASG की दलील

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट में आज एक महिला की तरफ से दायर 26 हफ्ते के गर्भ गिराने की अनुमति को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई शुरू की। मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ने कहा कि हमने एम्स की रिपोर्ट देखी। याचिकाकर्ता महिला प्रसवोत्तर मनोविकृति से पीड़ित है.. वह दवा ले रही है जिसका बच्चे पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ रहा है। उन्होंने उपचार के लिए वैकल्पिक व्यवस्था निर्धारित की है ताकि बच्चे को कोई खतरा न हो और बच्चे में कोई असामान्यता का पता न चले। एम्नियोटिक द्रव आदि निकालना एक बहुत ही इन्वेसिव प्रोसिजर है।

मामले की सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून में आज अजन्मे बच्चे या अजन्मे भ्रूण का कोई अधिकार नहीं है। यह यूके और कोलंबिया की अदालतों सहित पांच संवैधानिक अदालतों का निर्णय है। पिछले 12 वर्षों में सरकार की एक गाइडलाइन के माध्यम से भ्रूण हत्या की अनुमति दी गई है और इसे निखिल दातार मामले में निर्धारित किया गया था। सभी गर्भपात से भ्रूण की मृत्यु हो जाती है क्योंकि यह बच्चे के दिल को स्थिर कर देता है। इस पर सीजेआई ने कहा कि तो आप कह रहे हैं कि यदि कोई महिला 33 सप्ताह में आती है तो उसे गर्भपात की अनुमति दी जानी चाहिए.. तो बच्चे की असामान्यताएं या मां के लिए जोखिम के बावजूद.. एक सप्ताह पहले भी वह बच्चे से छुटकारा पा सकती है?

तो आप कह रहे हैं कि यदि कोई महिला 33 सप्ताह में आती है तो उसे गर्भपात की अनुमति दी जानी चाहिए.. तो बच्चे की असामान्यताएं या मां के लिए जोखिम के बावजूद.. एक सप्ताह पहले भी वह बच्चे से छुटकारा पा सकती है?
डीवाई चंद्रचूड़, सीजेआई

इससे पहल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एम्स मेडिकल बोर्ड से भ्रूण के हेल्थ पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर नई रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया था। इस मामले में 26 सप्ताह के हेल्दी भ्रूण के गर्भकालीन जीवन के अधिकार और प्रेगनेंट महिला को अपनी गर्भावस्था को समाप्त करने की पसंद के मामले में कानून और नैतिकता से जुड़ा सवाल सामने है। अदालत यह नैतिक दुविधा है कि बच्चे के जन्म का आदेश दिया जाए या मां की पसंद का सम्मान किया जाए। मामले की सुनवाई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ कर रही है।

महिला को मिली थी गर्भपात की अनुमति
यह मामला जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ के सामने उस समय आया जब दो जजों की पीठ ने महिला को 26-सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने के अपने 9 अक्टूबर के आदेश को वापस लेने की केंद्र की याचिका पर खंडित फैसला सुनाया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को महिला को गर्भपात कराने की अनुमति दी थी कि वह डिप्रेशन से पीड़ित है। साथ ही ‘भावनात्मक, आर्थिक और मानसिक रूप से’ तीसरे बच्चे का पालन-पोषण करने की स्थिति में नहीं है।

अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत :SC
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की थी। शीर्ष अदालत का कहना था कि निस्संदेह, महिला की स्वायत्तता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा था कि महिला को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार है, लेकिन समान रूप से, आपको इस तथ्य से भी अवगत होना चाहिए कि आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह अजन्मे बच्चे के अधिकारों को प्रभावित करने वाला है। अदालत ने कहा था कि यह जीवित भ्रूण है। कोर्ट ने पूछा था कि महिला 26 सप्ताह तक क्या कर रही थी? उसे पहले दो बार गर्भधारण हुआ था। वह गर्भावस्था के परिणामों को जानती है। अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा था कि क्या आप चाहते हैं कि हम एम्स के डॉक्टरों से कहें कि (वे) भ्रूण की दिल की धड़कने बंद कर दें। अदालत ने साफ कहा था कि हमें अजन्मे शिशु के अधिकारों और माता के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है।

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