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Chandrayaan-3 से है विक्रम साराभाई का ये खास कनेक्शन, इस काम के बिना ISRO नहीं कर पाता चांद पर लैंडिंग

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नई दिल्ली

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग के बाद भारत वहां पहुंच गया है जहां पहले कोई देश नहीं पहुंचा है। अंतरिक्ष अभियान में बड़ी छलांग लगाते हुए भारत का चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3’ बुधवार शाम 6 बजकर 4 मिनट पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरा। मिशन की सफलता के बाद भारत चांद के इस क्षेत्र में उतरने वाला दुनिया का पहला और चंद्र सतह पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है। लैंडिंग के अगले दिन चंद्रयान-3 मिशन से जुड़ा अपडेट देते हुए इसरो ने कहा कि रोवर ‘प्रज्ञान’ लैंडर ‘विक्रम’ से अलग हो गया है।

इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC) और फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री (PRL) ने चंद्रयान -3 मिशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। दोनों संस्थानों की स्थापना भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई द्वारा अहमदाबाद में की गई थी।

SAC ने चंद्रयान-3 मिशन के लिए आठ कैमरा सिस्टम बनाए
लैंडिंग प्रक्रिया में इसरो सैक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने लैंडर पर कई सेंसर विकसित किए हैं, जिनमें खतरे का पता लगाने और बचाव कैमरा और प्रसंस्करण एल्गोरिदम शामिल हैं। SAC ने चंद्रयान-3 मिशन के लिए आठ कैमरा सिस्टम विकसित किए हैं, जिनमें से चार लैंडर पर और एक रोवर पर है। लैंडर पर लगे तीन अन्य कैमरों ने लैंडिंग में अहम भूमिका निभाई।

इसरो SAC के निदेशक नीलेश देसाई ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “लैंडर पोजिशन डिटेक्शन कैमरा (LPDC) लैंडर के नीचे आते समय उसकी स्थिति बताएगा, जिससे हमें चंद्रमा की जमीन पर 30 किलोमीटर की दूरी के दौरान देशांतर और अक्षांश का विवरण मिलेगा। अन्य दो कैमरे लैंडिंग के दौरान वास्तविक समय में तस्वीरें लेंगे और संग्रहीत छवियों के साथ संबंधित करके यह पता लगाएंगे कि लैंडिंग सही जगह पर हो रही है या नहीं। जिसके अनुसार वह लैंडर के ट्रैक को समायोजित करेंगे, ताकि वह निर्धारित लैंडिंग साइट पर उतर सके।

मिशन पर भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद से दो वैज्ञानिक पेलोड ले जाए गए हैं। रोवर पेलोड को अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर कहा जाता है, और लैंडर पेलोड को चंद्रा सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट (ChasTE) कहा जाता है। दोनों पेलोड चंद्रयान-2 मिशन का भी हिस्सा थे, लेकिन सॉफ्ट लैंडिंग विफलता के कारण उनका उपयोग नहीं किया जा सका। जिसके चलते लैंडर और रोवर और संबंधित पांच पेलोड नष्ट हो गए।भारत से पहले चांद पर सोवियत संघ, अमेरिका और चीन ही सफल सॉफ्ट लैंडिंग कर पाए हैं, लेकिन ये देश भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग नहीं कर पाए।

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