11.3 C
London
Monday, April 13, 2026
Homeराष्ट्रीयचुप रहने का अधिकार देने वाला अनुच्छेद 20(3) क्या है, सुप्रीम कोर्ट...

चुप रहने का अधिकार देने वाला अनुच्छेद 20(3) क्या है, सुप्रीम कोर्ट ने जिसका जिक्र कर सीबीआई को खूब फटकारा

Published on

नई दिल्ली

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत के बाद तिहाड़ जेल से निकल गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की खंडपीठ ने गुरुवार को अपने आदेश में कहा कि केस की स्थिति को देखते हुए अरविंद केजरीवाल जमानत पर जेल से रिहा होने के हकदार हैं। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां ने अपने अलग-अलग आदेश पढ़े और दोनों ने जमानत के पक्ष में फैसला दिया। लेकिन अरविंद केजरीवाल की सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी वैध थी या नहीं, इस पर दोनों जजों की राय बंट गई। पीठ के अध्यक्ष जस्टिस सूर्यकांत ने जहां सीबीआई की कार्रवाई को वैध ठहराया तो जस्टिस भुइयां ने कहा कि सीबीआई ने गलत मंशा से केजरीवाल को गिरफ्तार किया था।

अनुच्छेद 20(3) को जानिए
उन्होंने सीबीआई की तरफ से गिरफ्तारी के लिए दिए गए आधार पर ही सवाल उठा दिया गया। जस्टिस भुइयां ने साफ कहा कि किसी भी आरोपी से जबरन अपने खिलाफ गवाही नहीं दिलवाई जा सकती है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत मौलिक अधिकार की तरफ इशारा किया और कहा कि यह आरोपी का अधिकार है कि पूछताछ में वो कुछ बोले या नहीं। उसकी चुप्पी का यह मतलब नहीं निकाला जा सकता है कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा है या आरोप सही हैं। आइए जानते हैं कि संविधान का अनुच्छेद 20(3) क्या है जिसका हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के सवालों पर अरविंद केजरीवाल की चुप्पी को जायज ठहराया।

आरोपी की चुप्पी का कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। इस आलोक में याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी का जो आधार दिया गया है वह पूरी तरह अमान्य है। ऐसे आधारों पर ऐसे आधारों पर अपीलकर्ता को सीबीआई मामले में आगे भी हिरासत में रखना न्याय का मखौल होगा, खासकर तब, जब उसे पीएमएलए के अधिक कड़े प्रावधानों के तहत उन्हीं आरोपों पर पहले ही जमानत मिल चुकी है।
जस्टिस उज्जल भुइयां

संविधान के भाग तीन के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों का वर्णन है। इन्हीं मौलिक अधिकारों में एक ‘अपराधों की दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण का अधिकार’ भी है जिसका वर्णन अनुच्छेद 20 में है। यह अनुच्छेद आपराधिक कार्यवाही में कुछ अधिकारों की रक्षा करता है। यह आत्म दोष, दोहरे खतरे और पूर्वव्यापी दंड के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद 20(3) में स्पष्ट कहा गया है, ‘किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ गवाही देने को मजबूर नहीं किया जा सकता है।’

अपराधों की दोषसिद्धि से संरक्षण का मतलब समझिए
इसका मतलब है कि किसी अपराध के आरोप में पूछताछ के वक्त आरोपी से उसके ऊपर लगे आरोपों को जबर्दस्ती नहीं मनवाया जा सकता है। संविधान के तहत हर नागरिक का यह अधिकार है कि वह अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज कर दे या फिर आंशिक रूप से स्वीकार करे या पूरी तरह स्वीकार कर ले। इतना ही नहीं, आरोपी अगर पूछताछ में कोई जवाब नहीं देना चाहता तो बिल्कुल चुप रह सकता है, उससे आरोप स्वीकार करवाना तो दूर, जबरन चुप्पी भी नहीं तुड़वाई जा सकती है।

ऐसा नहीं हो सकता कि जब कोई आरोपी जांच एजेंसी के प्रश्नों का उसी प्रकार उत्तर देता है जिस प्रकार जांच एजेंसी चाहती है, तभी इसका अर्थ होगा कि आरोपी जांच में सहयोग कर रहा है।
जस्टिस उज्जल भुइयां

केजरीवाल की गिरफ्तारी का आधार ही गलत?
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के इसी अनुच्छेद का जिक्र कर कहा कि अरविंद केजरीवाल को सीबीआई इस आधार पर गिरफ्तार नहीं कर सकती है कि उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोप नहीं कबूले। जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा, ‘आरोपी की चुप्पी का कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। इस आलोक में याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी का जो आधार दिया गया है वह पूरी तरह अमान्य है। ऐसे आधारों पर ऐसे आधारों पर अपीलकर्ता को सीबीआई मामले में आगे भी हिरासत में रखना न्याय का मखौल होगा, खासकर तब, जब उसे पीएमएलए के अधिक कड़े प्रावधानों के तहत उन्हीं आरोपों पर पहले ही जमानत मिल चुकी है।’

पूछताछ में सहयोग नहीं देने की अवधारणा का क्या?
तो सवाल उठता है कि क्या पूछताछ में सवालों के जवाब नहीं देना, जांच में सहयोग नहीं करना नहीं है? यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है कि पुलिस या अन्य जांच एजेंसियां इसी आधार पर आरोपी को अक्सर गिरफ्तार कर लेती हैं। अदालतें भी जांच में सहयोग नहीं किए जाने पर हुई गिरफ्तारियों को जायज ठहराती हैं। सुप्रीम कोर्ट जज ने इस पर भी स्थिति स्पष्ट की।

जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘ऐसा नहीं हो सकता कि जब कोई आरोपी जांच एजेंसी के प्रश्नों का उसी प्रकार उत्तर देता है जिस प्रकार जांच एजेंसी चाहती है, तभी इसका अर्थ होगा कि आरोपी जांच में सहयोग कर रहा है।’ मतलब, पूछताछ करने वाला जिस रूप में प्रश्नों का उत्तर चाहता है, अगर आरोपी वैसा ही जवाब नहीं दे तो जांच एजेंसी यह नहीं कह सकती कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। स्पष्ट है कि मनमुताबिक जवाब नहीं मिलने को जांच में सहयोग से इनकार का आधार बनाकर गिरफ्तारी नहीं की जा सकती है।

Latest articles

बेटियों और बहनों के विकास से ही होगा समग्र विकास संभव : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने 1.25 करोड़ लाड़ली बहनों के खातों में अंतरित किए 1836...

गोविंदपुरा औद्योगिक इकाई पर कार्रवाई की तैयारी, जवाब नहीं देने पर होगा कड़ा कदम

भोपाल। जिला व्यापार एवं उद्योग केन्द्र भोपाल द्वारा एक औद्योगिक इकाई के खिलाफ गंभीर...

देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी : रामनाथन

बीएचईएल द्वारा आईपी आउटर केसिंग की आपूर्ति तथा ईओटी क्रेन का लोकार्पण हरिद्वार। बीएचईएल हरिद्वार...

किसान देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़, किसानों के विकास के लिए हम हैं प्रतिबद्ध : केन्द्रीय रक्षा मंत्री सिंह

किसानों के श्रम से देश का खाद्यान्न निर्यात हुआ दोगुना : मुख्यमंत्री डॉ. यादव किसानों...

More like this

एचपीसीएल में ‘निदेशक विपणन’ के लिए आवेदन आमंत्रित, महारत्न कंपनी में उच्च स्तरीय नेतृत्व का अवसर

मुंबई/भोपाल। ऊर्जा क्षेत्र की प्रमुख महारत्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड...

केरलम में शशि थरूर के काफिले पर हमला, गनमैन और ड्राइवर को पीटा, एक आरोपी गिरफ्तार

नई दिल्ली। केरलम के मलप्पुरम जिले के वांडूर इलाके में शुक्रवार शाम कांग्रेस सांसद...

युवा विधायक सम्मेलन में जुटे दिग्गज, ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प पर हुआ मंथन

भोपाल मध्यप्रदेश विधानसभा में आयोजित दो दिवसीय 'युवा विधायक सम्मेलन' के दूसरे दिन संसदीय गरिमा...