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‘खेला’ हो न हो.. ‘खेला’ का डर बना रहेगा! धार की राजनीति के चैंपियन रहे हैं नीतीश

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पटना:

बिहार के इकलौते नेता नीतीश कुमार हैं, जो ‘खेला’ करें या ना करें पर ‘खेला’ का भय दिखा कर अपने मन की राजनीति करते हैं। इसे संयोग कह लें या हकीकत, कभी-कभी स्थितियां ऐसी बन जाती है। जहां ‘खेला’ होने का एक बड़ा स्पेस दिखाई पड़ता है। वर्ष 2024 लोकसभा चुनाव के परिणाम को ही देख लें तो नीतीश कुमार के पास ‘खेला’ करने का स्पेस खुद-ब-खुद चला आया है। लोकसभा चुनाव 2024 में बिहार की 40 सीटों में से एनडीए को 30 सीटों पर जीत मिली है। जदयू को 12 सीटों पर सफलता मिली। ये संख्या बल इसलिए महत्वपूर्ण हो गया कि भाजपा को लोकसभा चुनाव में बहुमत नहीं मिली। एनडीए के अन्य दलों की सीटों को जोड़ दें तो वो संख्या 292 यानी बहुमत से 20 ज्यादा।

भय का ‘खेला’ यहां से शुरू होता है!
भारतीय राजनीति की बात करें तो नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अन्य दलों को जोड़ कर गठबंधन बनाने की शुरुआत टीडीपी के नेता चंद्रबाबू नायडू ने की, मगर सफलता नहीं मिली। नरेंद्र मोदी के विरुद्ध गठबंधन बनाने की दूसरी कोशिश नीतीश कुमार ने की। गठबंधन बनाने में सफल हुए। मगर, कांग्रेस और राजद की रणनीति के शिकार हो गए। फिर क्या पीएम और कन्वेनर को लेकर नीतीश कुमार की स्थितियां प्रतिकूल हुई और वे इंडिया गठबंधन छोड़ पुनः एनडीए में शामिल हो गए।

‘खेला’ को लेकर एक बार फिर चर्चा अगर तेज है तो इसकी वजह ये है कि नीतीश कुमार एनडीए की बैठक में शामिल होने के लिए जिस फ्लाइट (विस्तारा UK-718) से दिल्ली गए, उसी प्लेन से तेजस्वी यादव इंडिया गठबंधन की बैठक में भाग लेने दिल्ली जा रहे थे। अब इस संयोग को हवा इस रूप में लग गई कि क्या यात्रा के दौरान इंडिया गठबंधन में लौटने को लेकर बात तो नहीं हुई? इस शंका को बल इसलिए भी मिला कि खबर आ रही थी कि एनसीपी नेता शरद पवार ने नीतीश कुमार से बात की। मीसा भारती का बयान आया कि चाचा आ जाओ।

आखिर नीतीश से भय की वजह क्या है?
भय के पीछे का कारण ये भी है कि नीतीश कुमार ने दो-दो बार एनडीए और महागठबंधन का साथ छोड़ा है। साथ छोड़ने का कारण वो अपने आसपास के लोगों को बताते हैं। महागठबंधन का साथ छोड़ा तो बताया कि संजय झा ने कहा इसलिए एनडीए में चले आए। जब महागठबंधन के साथ गए तो ठिकरा ललन सिंह और विजेंद्र यादव पर फोड़ा था। ये राजनीतिक परिवर्तन के फैक्टर बनते हैं, आज भी नीतीश कुमार के पास ही हैं।

याद कीजिए मोतिहारी सेंट्रल यूनिवर्सिटी का संबोधन, सीएम नीतीश कुमार तब महागठबंधन में थे। मोतिहारी केंद्रीय विश्वविद्यालय में अपने संबोधन में भाजपा नेताओं की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि ये लोग तो हमारे साथ थे। हम आप सबों को भूलेंगे कभी। उनके इस बयान के बाद महागठबंधन के लोग सकते में रहे कि कब वे पलटी मार देंगे? राजद नेता व्यवहार कुशल होते दिखे। ऐसी कोई बात नहीं होने देते, जिससे वे फिर भाजपा में चले जाएं। डर-डर कर कुछ दिन साथ रहे और एक दिन नीतीश कुमार ने एनडीए का दामन थाम लिया।

एक अविश्वसनीय चेहरा नीतीश: बागी
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी का मानना है कि अविश्वसनीय चेहरा तो बन ही गए हैं। मेरा मानना है कि अगर इंडिया गठबंधन से पीएम का प्रपोजल आ जाए तो निश्चित रूप से नीतीश कुमार एनडीए का साथ छोड़ इंडिया का दामन थाम लेंगे। लेकिन मेरी सूचना के अनुसार ऐसा कोई ऑफर आने वाला नहीं है। इसलिए, नीतीश कुमार ज्यादा से ज्यादा मंत्रालय चाहेंगे। कुछ विशेष विभाग के प्रति आग्रही होंगे और विशेष राज्य का दर्जा नहीं तो विशेष पैकेज की मांग कर सकते हैं।

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