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कैबिनेट विस्तार से जेडीयू ने क्यों किया किनारा, क्या नीतीश ने भांप लिया ये ‘खतरा’?

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पटना

बिहार में अचानक हुआ मंत्रिमंडल विस्तार चौंकाने वाला तो था ही, मगर उस से भी ज्यादा चौंका गया इस विस्तार में जदयू का किनारा कर लेना। जनता दल (यू) का यह निर्णय न केवल राजनीतिक जगत को बल्कि जेडीयू के विधायकों और कार्यकर्ताओं के लिए भी ये सहज विश्वसनीय नहीं था। जब कभी भी फोन किया, जवाब यही मिल रहा था कि आधिकारिक घोषणा होने तो दीजिए। जब ये हुआ तो लगा जनता दल (यू) परिसर में सन्नाटा छा गया। सवाल ये उठ रहा है कि आखिर क्यों? राजनीतिक गलियारों में मंत्रिमंडल विस्तार सवाल की तरह गूंज रहा है।

कैबिनेट विस्तार से जेडीयू ने क्यों किया किनारा?
मंत्रिमंडल के विस्तार की जब खबर आग की तरह फैली तो सबसे पहला सवाल हिस्सेदारी को लेकर उठाया गया। विधायकों की संख्या को मानक मान कर मंत्रियों की संख्या का गणना शुरू हो गई। विस्तार से पहले मंत्रियों की संख्या मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सहित 30 थी। भाजपा की हिस्सेदारी दो उपमुख्यमंत्री समेत कुल 15 थी। इसके अलावा एक हम और एक निर्दलीय मंत्री थे। ऐसे में छह भाजपा और जदयू सिर्फ दो नए मंत्री बना सकती थी। चर्चा ये है कि ऐसे में जदयू के भीतर जातीय समीकरण को तुष्ट करना संभव नहीं था। एक जाति से दो बनते तो दूसरी जाति के नेताओं से नाराजगी का भी खतरा उठाना पड़ता, इसलिए जदयू ने चुप्पी साध ली।

…तो इसलिए नीतीश कुमार ने बैलेंस बनाए रखा?
दूसरा तर्क ये दिया जा रहा है कि जदयू का जातीय संतुलन बरकरार है, इसलिए कोई छेड़छोड़ नहीं। जदयू अपने आधार वोट को पुष्ट कर रखा है। अब कुर्मी जाति से ले तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मंत्री श्रवण कुमार मंत्रिपरिषद में शामिल हैं। अतिपिछड़ा की बात करें तो मदन सहनी और शीला मंडल मंत्री हैं ही। भूमिहार से विजय चौधरी और राजपूत से लेशी सिंह और अपरोक्ष रूप से सुमित कुमार मंत्री हैं ही। यादव से विजेंद्र यादव मंत्री हैं। दलित की बात करें तो रत्नेश सदा और अशोक चौधरी मंत्री हैं। मुस्लिम से जमा खान मंत्री हैं। इसलिए पार्टी के भीतर कोई विवाद न हो इसलिए विस्तार से किनारा किया।

क्या नीतीश को अपने नए मंत्रियों पर भरोसा नहीं?
भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल होना कबूल किया तो उसके पीछे एक-एक मंत्री के पास तीन-तीन विभाग हैं। नए मंत्रियों के बीच उन्हीं विभागों को बांटा जाएगा। जदयू अब अपने अधीन किसी विभाग के बंटवारे को लेकर तैयार भी नहीं। अंदरखाने की मानें तो जो विभाग विजेंद्र यादव और विजय चौधरी के पास है, उसे उसी अंदाज से नए मंत्री निभा पाएंगे या नहीं? इसलिए इस महत्वपूर्ण विभाग को अंतिम समय में देने का जोखिम उठाने को जदयू रणनीतिकार तैयार नहीं थे।

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