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Tuesday, January 13, 2026
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हां करें, ना करें, क्या करें… पहली बार BJP के आगे इतना बेबस हो गया विपक्ष

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राष्ट्रपति पद के लिए द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी से विपक्षी खेमे में बड़ी चौड़ी और गहरी दरार पैदा हो गई है। हालिया वक्त में बीजेपी को अपनी किसी चाल से इस स्तर की सफलता नहीं मिली थी। उद्धव ठाकरे अभी-अभी बीजेपी पर छल करने का आरोप मढ़ रहे थे, लेकिन मुर्मू के प्रति अपने सांसदों के मन में उमड़ते सद्भाव को देखकर समर्थन की घोषणा करने को मजबूर हो गए। उद्धव ठाकरे को एक तरफ पार्टी में फिर से भगदड़ मचने का डर है तो दूसरी तरफ उनके सामने महाविकास अघाड़ी (MVA) के सहयोगियों- कांग्रेस और एनसीपी को साधने की कठिन चुनौती है। ऐसे में उनका मुर्मू को समर्थन देना उनकी नेतृत्व क्षमता में भारी गिरावट और विपक्षी खेमे का एक वफादार सहयोगी साबित करने में उनकी अक्षमता का प्रतीक है। उद्धव का ‘निष्पक्ष’ नजरिया महाराष्ट्र में बीजेपी के लिए वाकई बहुत फायदेमंद साबित होने जा रहा है।

2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में जब बीजेपी ने खुद को छोटा सहयोगी मानने से इनकार कर दिया तब शिवसेना चौकस हो गई। उसे लगा कि बीजेपी बाकी भारत की तरह ही महाराष्ट्र में भी खुद को हिंदुत्व का अकेला झंडाबरदार साबित करने के गेमप्लान पर आगे बढ़ रही है। एकनाथ शिंदे का विद्रोह भी इसी बात की पुष्टि करता है कि ज्यादातर शिवसैनिक राज्य में बीजेपी के दबदबे को स्वीकार कर चुके हैं।

बहरहाल, उद्धव ठाकरे का दबाव के आगे झुकना, एनसीपी और कांग्रेस के लिए भी रिएलिटी चेक ही है। दोनों पार्टियों ने उद्धव ठाकरे के जरिए महाराष्ट्र में हिंदुत्ववादी मतदाताओं में विभाजन का बड़ा सपना देख रखा था जो अब पूरी तरह बिखर गया है। तीनों दलों की अघाड़ी अगर बच जाती है और उनके बीच निकाय चुनावों लिए सीटों का बंटवारा हो जाता है तो इतना तय है कि अब एनसीपी-कांग्रेस भी उद्धव के प्रति बहुत उदारता नहीं दिखाएगी।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी इसी संकट से जूझ रहे हैं। द्रौपदी मुर्मू का विरोध करने से उनकी पार्टी झारखंड मुक्ती मोर्चा (JMM) के आदिवासी जनाधार को आक्रोशित कर सकता था। लेकिन समर्थन करने से कांग्रेस के साथ उनके गठबंधन पर असर पड़ सकता है। इधर, बीजेपी की तरफ हाथ बढ़ाकर भी सोरेन अपने ऊपर का खतरा टलने को लेकर निश्चिंत नहीं हो सकते हैं। खनन पट्टा मामले में उनका मुख्यमंत्री पद खतरे में है।

महाराष्ट्र में शिवसेना के हिंदुत्व की तरह ही जेएमएम के आदिवासी आइडेंटिटी पॉलिटिक्स को भी बीजेपी अपने ‘हिंदू एकता अभियान’ के बैनर तले छीनना चाहती है। बीजेपी को इस मामले में काफी सफलता भी मिल रही है। उसके आदिवासी वोटरों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। अगर जेएमएम पाला बदलकर उसके खेमे में आ जाए तो बीजेपी के लिए आदिवासी मतों में सेंध लगाने की गति और तेज हो जाएगी। दूसरी तरफ जेएमएम का वोट बैंक तेजी से सिकुड़ता जाएगा जैसा कि महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ हुआ। बीजेपी ने बिहार में जेडी(यू), तमिलनाडु में एआईएडीएमके, कर्नाटक में जेडी(एस) जैसी पार्टियों को भी भारी उलझन में फंसा दिया है। वो समझ नहीं पा रहे हैं कि साथ चला जाए, विरोध किया जाए या फिर निष्पक्ष रहा जाए?

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