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जेल से निकलने के बाद मोहम्मद जुबैर ने ये अपना ट्वीट किसके लिए लिखा?

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नई दिल्ली

फैक्ट चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के को-फाउंडर मोहम्मद जुबैर को धार्मिक भावनाएं भड़काने के केस में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से राहत मिल गई है और अब वह जमानत पर बाहर हैं। जमानत से मिली राहत पर जुबैर ने ट्वीट कर देश और दुनिया से मिले उन्हें समर्थन के लिए शुक्रिया कहा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ यूपी में दर्ज सभी 6 एफआईआर पर अंतरिम जमानत देते हुए सभी FIR को एकसाथ क्लब करने का भी आदेश दे दिया था। जुबैर को दिल्ली में दर्ज एक मामले में पहले ही जमानत मिल गई थी।

जुबैर का शुक्रिया वाला ट्वीट
जुबैर ने अपनी सेल्फी के साथ एक ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा है, ‘जो आज साहिब-ए-मसनद है कल नहीं होंगे! आप सभी का धन्यवाद। पिछले एक महीने में मुझे भारत और दुनियाभर में मिले समर्थन के लिए मैं गदगद हूं। आपका समर्थन मुझे और मेरे परिवार को काफी मजबूती देता है।’

जुबैर के खिलाफ दिल्ली पुलिस को मिला समय
उल्लेखनीय है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में एक हिंदू देवता पर किए गए कथित आपत्तिजनक ट्वीट से संबंधित एक मामले में ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी और तलाशी तथा जब्ती कवायद के खिलाफ याचिका पर जवाब देने के लिए दिल्ली पुलिस को बुधवार को समय दे दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट को सूचित किया कि निचली अदालत ने उन्हें इस महीने की शुरुआत में जमानत दे दी थी और उन्होंने पीठ से याचिका में किए गए अनुरोध पर उन्हें राहत देने का आग्रह किया। दिल्ली पुलिस के वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव से चार सप्ताह का समय मांगा। जस्टिस ने कहा, ‘मामले पर चार सप्ताह के बाद विचार किया जाएगा।’

जुबैर की याचिका पर नोटिस
हाईकोर्ट ने एक जुलाई को जुबैर की याचिका पर नोटिस जारी किया था और जांच एजेंसी को याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। याचिका में निचली अदालत के 28 जून के आदेश को चुनौती दी गई थी। उल्लेखनीय है कि निचली अदालत ने जुबैर को चार दिन की पुलिस हिरासत में देने का आदेश दिया था। दिल्ली पुलिस ने जुबैर को एक ट्वीट के जरिए धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में 27 जून को गिरफ्तार किया था। ग्रोवर ने अदालत के समक्ष तर्क दिया था कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी के बाद पारित पुलिस रिमांड का आदेश उसके आवेदन को ध्यान में रखे बिना दिया गया था और उनके खिलाफ कोई अपराध तय नहीं किया गया था।

अंतरिम राहत के रूप में, ग्रोवर ने अनुरोध किया था कि जब तक हाईकोर्ट के जरिए याचिका पर फैसला नहीं किया जाता है, पुलिस जुबैर के लैपटॉप को जब्त नहीं करेगी क्योंकि ट्वीट एक मोबाइल फोन के माध्यम से किया गया था, न कि कंप्यूटर के माध्यम से। दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका की विचारणीयता के संबंध में आपत्ति जताई थी और कहा था कि प्राथमिकी दर्ज किया जाना केवल ‘कार्रवाई की शुरुआत’ है।

गौरतलब है कि जुबैर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 153 ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान, भाषा, आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 295 ए (धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य) के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस ने कहा था कि एक ट्विटर उपयोगकर्ता की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया था, जिसने जुबैर पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया था।

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