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श‍िवसेना मामले में सोमवार को अगली सुनवाई, श‍िंदे ने कहा- हम अभी भी श‍िवसैनिक

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मुंबई

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट की ओर से दायर याचिका पर शिंदे गुट से जवाब मांगा था। आज सुप्रीम कोर्ट की बेंच सबसे पहले इस मामले पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान एकनाथ श‍िंदे ने कहा क‍ि हमारे ऊपर अयोग्‍यता का आरोप गलत, हम अभी भी श‍िवसैनिक हैं। सुप्रीम कोर्ट में श‍िंदे की दलील यह याचिका महाराष्‍ट्र में मौजूदा राजनीति संकट को लेकर उद्धव ठाकरे गुट ने दायर की है। इन याचिकाओं में उठाए गए कुछ संवैधानिक सवालों को लेकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुआई वाले प्रतिद्वंद्वी गुट से बुधवार को नए सिरे से जवाब दाखिल करने को कहा था।

बुधवार को कोर्ट में उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि शिंदे गुट में जाने वाले विधायक संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता से तभी बच सकते हैं, अगर वे अलग हुए गुट का किसी अन्य पार्टी में विलय कर देते हैं। उन्होंने पीठ से कहा कि उनके बचाव का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

दोनों पक्षों के वकील सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई
शिंदे गुट की तरफ से वकील हरीश साल्वे ने बहस की शुरुआत की। उन्होंने बताया कि कानून के सवाल दाखिल कर दिए गए हैं।

साल्वे- ने कहा कि अगर स्पीकर को फैसला लेने में एक महीने, दो महीने यह तीन महीने लगते हैं, ऐसे में क्या अयोग्य विधायक काम करना बंद कर देते हैं?

साल्वे- जब तक अयोग्यता पर फैसला नहीं होता तब तक कुछ भी गलत नहीं है। हमने पार्टी नहीं छोड़ी है। हमने कोई अलग दल नहीं बनाया है।

साल्वे – अगर कोई भ्रष्ट आचरण से सदन में चुना जाता है और जबतक वो अयोग्य घोषित नहीं होता। तब तक उसके द्वारा की गई कार्रवाई कानूनी होती है।

साल्वे- ने कहा कि विधायकों की अयोग्यता पर स्पीकर फैसला लेने में 2 – 3 महीने की देरी करते हैं। इस स्थिति में क्या होना चाहिए? क्या उन्हें सदन की कार्यवाही में भाग लेना चाहिए? इस दौरान जो कानून पास होता है, उसका क्या होगा?

साल्वे- मान लीजिए अगर कोई पार्टी कोई व्हिप जारी करती है और उस पार्टी का एक सदस्य कहता है कि वो उसका समर्थन नहीं करता और बाद में पार्टी को एहसास होता है कि अगर बात का समर्थन करने के लिए व्हिप जारी किया था। तब पार्टी उस सदस्य के खिलाफ करवाई नही करती जो व्हिप के खिलाफ गया था। नियम ऐसे भी काम करता है।

सीजेआई- सिर्फ दल-बदल विरोधी कानून आकर्षित नहीं होता?

साल्वे- जब तक उनके चुनाव रद्द नहीं हो जाते, तब तक सभी कार्रवाई कानूनी है। दलबदल विरोधी कानून असहमति विरोधी कानून है।

सीजेआई- क्या आप हमें इस पर कोई उदाहरण दे सकते हैं?

सीजेआई- राजनीतिक दल को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह लोकतंत्र के लिए खतरा होगा।

साल्वे- कोर्ट में याचिका दाखिल करने और अयोग्यता के खिलाफ कार्रवाई दो महीने बाद होती है और उस दौरान कोई सदन में वोट दे देता है तो ऐसा नहीं है कि दो महीने बाद वो अयोग्य होता है तो उसका वोट मान्य नहीं होगा। ऐसे में केवल उसे अयोग्य माना जाएगा न कि उसके द्वारा किये गए वोट को।

सीजेआई- जब आप कोर्ट आये थे तब हमनें कहा था की स्पीकर इस मामले का (अयोग्यता) का निपटारा करेंगे न की सुप्रीम कोर्ट और न ही हाई कोर्ट।

सीजेआई- संविधान पीठ के समक्ष जो सवाल आये हैं हमारे पास उन्हें हम देख रहे हैं।

सीजेआई- ने सिब्बल से पूछा कि राजनीतिक पार्टी की मान्यता, यह मामला है। इस में हम दखल कैसे दें? यह चुनाव आयोग में मामला है।

सिब्बल- ने कहा कि मान लीजिये कि इलेक्शन कमीशन इस मामले में एक फैसला देता है और अब अयोग्यता पर फैसला आता है तो फिर क्या होगा?

सिंघवी-ने कहा की पहले अयोग्यता पर फैसला आना चाहिए।

सिब्बल-ने कहा कि 30/40 विधायक किसी भी राजनीतिक पार्टी पर कह सकते है कि वो ही असली पार्टी हैं।

चुनाव आयोग की तरफ से बहस शुरू

चुनाव आयोग- अगर ऐसे मामलों में कोई पक्ष आयोग आता है तो उस समय आयोग का ये फर्ज है कि वो तय करें कि असली पार्टी कौन है?

चुनाव आयोग- हम एक अलग संवैधानिक संस्था है। हमनें दस्तावेज मांगे है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से अलग है।

साल्वे- मान लीजिए कि सभी लोग अयोग्य हो जाते है और चुनाव आता है तो क्या हम यह नहीं कह सकते कि हम असली पार्टी हैं।

सीजेआई- ने चुनाव आयोग को कहा कि इस मामले में कोई फैसला न लें। हलफनामा सभी पक्ष दायर कर सकते हैं। हम इसको लेकर आदेश जारी नहीं कर रहे हैं। इस मामले में कोई करवाई न करें।

सीजेआई- ने कहा 8 अगस्त को चुनाव आयोग में जवाब दाखिल करना है। अगर पार्टी जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगती है। तो चुनाव आयोग उसे समय देने पर विचार करे।

सोमवार को मामले की अगली सुनवाई…
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की सरकार का गठन सही है या नहीं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक बेंच को भेजा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट इसपर सोमवार तक कोई आदेश देगा।

शिंदे गुट ने दी यह दलील
इस पर शिंदे गुट का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि दलबदल कानून उन नेताओं के लिए हथियार नहीं है जो पार्टी के सदस्यों को एकजुट रखने में सफल नहीं हुए हैं। उन्‍होंने दलील दी कि यह मामला विधायकों की ओर से स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़े जाने का नहीं है।

‘दलबदल नहीं बगावत’
साल्वे ने आगे कहा कि यह दलबदल नहीं बल्कि यह पार्टी की आंतरिक बगावत का मामला है और किसी ने भी स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता नहीं छोड़ी है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद बेंच ने कहा कि वह इस मामले की सुनवाई गुरुवार को करेगी और फैसला देने के मुद्दे को तय करेगी। कोर्ट ने साल्वे से कानूनी सवालों का पुन: जवाब तैयार करने को कहा। बेंच गुरुवार को सबसे पहले इस मामले पर सुनवाई करेगी।

पार्टी के बंटवारे, विलय, बगावत और अयोग्यता पर हो रही सुनवाई
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति (CJI) एन वी रमण, जस्‍ट‍िस कृष्ण मुरारी और जस्‍ट‍िस हिमा कोहली की बेंच शिवसेना और बागी विधायकों की ओर से दायर याचिकाओं में पार्टी के बंटवारे, विलय, बगावत और अयोग्यता को लेकर उठाए गए संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रही थी।

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