इंटरनेट, टीवी और बिजली तक नहीं, IT हब आंध्र प्रदेश के इस गांव में वैदिक पद्धति से जीते हैं लोग

 श्रीकाकुलम

आंध्र प्रदेश में जिला पड़ता है श्रीकाकुलम। इस जिले में गांव है कुर्मा ग्राम। इस गांव की खासियत है कि यह एक वैदिक गांव है। गांव में एहसास होता है कि हमारे पूर्वज सदियों साल पहले कैसे रहा करते थे। यहां के घर मिट्टी के बने हैं। इस कच्चे घरों में सीमेंट, स्टील, सरिया किसी का भी प्रयोग नहीं किया गया है। 60 एकड़ में बसे इस गांव में 56 लोग रहते हैं। गांव के इस घरों में मिस्त्री या मजदूरों ने नहीं बल्कि गांव के लोगों ने अपने हाथों से ही बनाया है। कुर्माग्राम में न बिजली है और न ही इंटरनेट। मनोरंजन के लिए टेलीविजन तक नहीं है। किसी घर में कुकिंग गैस नहीं है, खाना चूल्हे पर बनता है। किसी के पास भी आधुनिक चीजें, उपकरण, गैजेट्स नहीं हैं। यहां तक कि ये लोग मोबाइल का प्रयोग भी नहीं करते हैं। पूरे गांव में सिर्फ एक बेसिक फोन लगा है। किसी को भी कहीं बात करना होता है तो वह इसी एक लैंडलाइन का प्रयोग करता है।

गरीबी नहीं, खुद से त्यागी भौतिक चीजें
गांव की जो स्थिति है, उसके बारे में पढ़कर आपको लगेगा कि यहां के लोग बहुत गरीब हैं। शायद गरीबी के चलते ही ये लोग मॉर्डन नहीं हो पाए हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये लोग सुविधाओं का आनंद नहीं उठा सकते लेकिन यहां के लोगों ने खुद से सब त्याग रखा है। यहां के लोग ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के कॉन्सेप्ट को फॉलो करते हैं। गांव में 14 परिवार और कुछ कृष्ण भक्त रहते हैं, जिन्होंने कृष्ण भक्ति को अपना जीवन समर्पित कर दिया है।

खुद बना कर पहनते हैं
कुर्मा ग्राम श्रीकाकुलम से लगभग 6 किलोमीटर दूर है। गांव के घर 9वीं शताब्दी के भगवान शअरीमुख लिंगेश्वर मंदिर की तर्ज पर बने हैं। यहां के लोगों का दिन सुबह साढ़े तीन बजे शुरू होता है और शाम को साढ़े सात बजे गांव के सारे लोग सो जाते हैं। गांव के लोग पहनने वाले कपड़े खुद बुनते हैं, खाने के लिए सब्जियां और अनाज भी खुद ही उगाते हैं। कोई किसी पर आश्रित नहीं है। यहां आने वाले लोगों को खाना भी खिलाते हैं, जिसे वे प्रसादम कहते हैं।

300 साल पहले की तरह जी रहे जीवन
गांव में रहने वाले राधा कृष्ण चरण दास ने कृष्ण भक्ति में अपनी आईटी जॉब छोड़ दी और एक टीचर बन गए। उन्होंने बताया कि हमारे पूर्वज 300 साल पहले जिस तरह का जीवन जीते थे, हम वैसे ही जीते हैं। नातेश्वर नरोत्तम दास इस गांव के गुरुकुल के मुखिया हैं। उन्होंने कहा कि भगवत गीता में भगवान कृष्ण ने जो बताया है हम उसी उद्देश्य पर जीवन जीते हैं।

चूल्हे पर पकाते हैं खाना
गांव की आजीविका जमीन और गायों पर आश्रित है। उन्होंने बताया कि गांव के लोग खुद से दालें, अनाज, फल, सब्जियां सब उगाते हैं। खाना पकाने के लिए बाकी जिन चीजों की जरूरत पड़ती है तो उसे हम पास के गांव में किसानों से खरीदकर लाते हैं। यहां चूल्हे पर ही खाना पकाया जाता है। जिसके लिए गाय के कोबर से बने कंडे और लकड़ियों का प्रयोग होता है।

गुरुकुल में ऐसे बीतता है दिन-रात
गांव के गुरुकुल में बच्चों को वैदिक स्टाइल में पढ़ाया जाता है। उन्हें नैतिकता और आदर्श का पाठ पढ़ाया जाता है। उच्च विचार रखने की ट्रेनिंग दी जाती है। गुरुकुल के एक शिष्ट सिद्धू सिंद्धांत ने बताया कि हम सुबह साढ़े तीन बजे सो कर उठ जाते हैं। साढ़े चार बजे तक मंगला आरती करके जापम करते हैं। मंत्रों के साथ किए जाने वाले मेडीटेशन को जापम कहते हैं। एक घंटे के जापम के बाद गुरु पूजा होती है और उसके बाद सभी किताबें पढ़ने बैठ जाते हैं। कक्षाएं सुबह 9 बजे शुरू होती हैं।

सारे विषयों की होती है पढ़ाई
गुरुकुल में पढ़ने वालों को गणित, विज्ञान, संस्कृत, तेलुगु, हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, कला और महाभारत पढ़ाई जाती है। कभी-कभी बच्चों से महाभारत और इतिहास की कहानियों और दृश्यों को लेकर नाटिका भी करवाई जाती है। बड़े इन नाटकों को देखते हैं और उनका मनोरंजन भी होता है। यहां पर रोज हरिकथा होती है।

खिलवाए जाते हैं कबड्डी जैसे खेल
गुरुकुल में, वे सीखने को सैद्धांतिक ज्ञान के संचय के रूप में नहीं बल्कि आत्म-साक्षात्कार के साधन के रूप में देखते हैं। इसलिए, बहुत सारी शारीरिक गतिविधियां भी होती हैं। बच्चों को स्वीमिंग से लेकर खेतों में कबड्डी और सात पत्थर जैसे खेल भी खिलवाए जाते हैं।

भक्ति वृक्ष, भक्ति शास्त्री और भक्ति वैभव की पढ़ाई
चरण दास ने कहा कि बच्चों के पास तीन पाठ्यक्रमों का विकल्प है – भक्ति वृक्ष, भक्ति शास्त्री और भक्ति वैभव। इन तीनों पाठ्यक्रमों में प्रत्येक में लगभग 10 वर्ष लगते हैं। आगे के पाठ्यक्रमों में उनकी रुचि के आधार पर, उन्हें सलेम, तमिलनाडु में वैदिक विश्वविद्यालय भेजा जाता है। हालांकि, यह एक छात्र पर निर्भर है कि वह आगे की पढ़ाई चुनता है या नौकरी।

बाहरी दुनिया से बेफिक्र
कूर्मग्राम के निवासियों को इस बात की परवाह नहीं है कि उनके आश्रम के बाहर क्या होता है, लेकिन उन्हें आगंतुकों से लगातार समाचार मिलते रहते हैं। यहां आने वाले लोगों की संख्या गांव की प्रसिद्धि के साथ बढ़ रही है। सप्ताह के दिनों में सैकड़ों तो रविवार को हजारों लोग आते हैं। यहां आश्रम में आने वाले लोगों में तेलंगाना और अन्य तटीय आंध्र जिलों की संख्या काफी ज्यादा है।

विदेशी भी आकर यहां रहते हैं
नरोत्तम दास ने कहा कि वे अपने आश्रम के आसपास के गांवों में आध्यात्मिकता और वैदिक ज्ञान का प्रसार कर रहे हैं। आश्रम और गुरुकुल में आने वाले हजारों लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान और कृष्णभावनामृत सिखाया जाता है। उन्होंने कहा कि बाहरी लोगों को आश्रम में रहने की अनुमति है यदि वे इसके सिद्धांतों का पालन करते हैं। आने वाले परिवारों और ब्रह्मचारी भक्तों को अलग-अलग रखा जाता है। कुछ विदेशी भक्तों ने भी कूर्मग्राम को अपना घर बना लिया है। अर्जेंटीना में जन्मी और अब एक इतालवी नागरिक, रूपा रघुनाथ स्वामी महाराज ने 40 से अधिक साल पहले 1978 में भारत आना शुरू किया था।

प्रकृति पर है भरोसा
नृहरी दास नाम का एक रूसी नागरिक गांव का स्थायी निवासी बन गया है। उसने कहा कि प्राचीन वैदिक ज्ञान मुझे इस भूमि पर लाया है। आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले लोगों को किसी भी चीज की चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनकी कठोर जीवन शैली से उत्पन्न होने वाली आवश्यकताएं प्रकृति द्वारा ही पूरी की जाती हैं।

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