कमंडल के साथ मंडल का कॉकटेल तैयार कर रही BJP! रामचरितमानस पर बैलेंस पॉलिटिक्स तो समझिए

लखनऊ

उत्तर प्रदेश में नगर निकाय चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले मंडल और कमंडल की राजनीति जोर पकड़ने लगी है। रामचरितमानस पर स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान के बाद अखिलेश यादव का समर्थन जातिगत राजनीति का साफ इशारा दे रहा है। इस पूरे मामले में भाजपा का स्टैंड दिलचस्प है। भाजपा मंडल और कमंडल पॉलिटक्स के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में दिख रही है। वह एक तरफ रामचरितमानस को लेकर हिंदुत्व की बात कर रही है, स्वामी और अखिलेश के बयान को समाज को बांटने वाला करार दे रही है, वहीं दूसरी तरफ खुद जातिगत जनगणना की पक्षकार बता रही है। अखिलेश जिस जातिगत जनगणना की बात कर रहे हैं, आमतौर पर हर मुद्दे पर उन्हें घेरने वाले यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य यहां उनके साथ खड़े नजर आते हैं, वह कहते हैं कि वे इसके पक्ष में हैं। इस बीच यूपी में संघ प्रमुख मोहन भागवत का पंडितों को लेकर बयान आ गया है। राजनीतिक विश्लेषक भागवत के बयान को कहीं न कहीं भाजपा की ‘बैलेंस पॉलिटिक्स’ से जोड़कर देख रहे हैं।

दरअसल सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पिछले दिनों जातीय जनगणना कराने की अपनी मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि जो लोग कहते हैं कि जातीय जनगणना नहीं हो सकती तो सरकार वे सरकार से हट जाएं। समाजवादी लोग तीन महीने में अगर जातीय जनगणना न करा दें तो बताइएगा। उन्होंने कहा कि बहुत से पिछड़े, दलित, आदिवासी, जिन्हें संविधान से जो अधिकार मिले, इस सरकार ने नहीं दिए। सरकार को बताना चाहिए कि खासकर यूपी के जो वाइस चांसलर बने उनमें से कितने दलित और पिछड़े हैं।

मैं हिंदू हूं, जातीय जनगणना होनी चाहिए: केशव मौर्य
अखिलेश के इस बयान के बाद जातीय जनगणना को लेकर यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से पूछा गया। केशव मौर्य जो आमतौर पर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर हमलावर रहते हैं। जातीय जनगणना के मुद्दे पर उनका रुख अलग देखने को मिला। केशव मौर्य ने साफ कहा कि वे इसके पक्ष में हैं। हालांकि उन्होंने अखिलेश यादव के ‘शूद्र’ वाले बयान पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जैसे दूध में नींबू डालकर उसे फाड़ने का काम किया जाता है, वैसे ही समाजवादी पार्टी समाज को बांटने का काम कर रहे हैं लेकिन ये साजिश सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि मैं अपने को हिंदू मानता हूं। गर्व से कहता हूं कि मैं हिंदू हूं।

डिप्टी सीएम केशव मौर्य के बयान से भाजपा की ‘बैलेंस पॉलिटिक्स’ का इशारा मिल जाता है। ये बात मोहन भागवत के ताजा बयान से और मजबूत हाेती दिख रही है। दरअसल मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख ने कहा कि जाति भगवान ने नहीं बनाई है। भगवान ने हमेशा बोला है, मेरे लिए सभी एक हैं, कोई जाति, कोई वर्ण नहीं है। ये श्रेणी पंडितों ने बनाई, जो गलत है। देश में चेतना और विवेक सब एक हैं। उनमें कोई अंतर नहीं है, बस मत अलग-अलग हैं। जब हर काम समाज के लिए है तो कोई ऊंच-नीच कैसे हो गया। उन्होंने कहा कि हमारे समाज को बांटकर लोगों ने हमेशा से फायदा उठाया है। सालों पहले देश में आक्रमण हुए, फिर बाहर से आए लोगों ने हमें बांटकर फायदा उठाया। नहीं तो हमारी ओर नजर उठाकर देखने की भी किसी में हिम्मत नहीं थी। इसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं। जब समाज में अपनापन खत्म होता है तो स्वार्थ अपने आप बड़ा हो जाता है।

मोहन भागवत के बयान से स्वामी प्रसाद मौर्य उत्साहित
मोहन भागवत का ये बयान आया तो सपा के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने इसे रामचरित मानस को लेकर अपनी मांग से इसे जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म की आड़ में महिलाओं, आदिवासियों, दलितों व पिछड़ों को गाली देने वाले तथाकथित धर्म के ठेकेदारों व ढोंगियों की कलई खोल दी। कम से कम अब तो रामचरित्र मानस से आपत्तिजनक टिप्पड़ी हटाने के लिये आगे आयें। यदि यह बयान मजबूरी का नहीं है तो साहस दिखाते हुए केंद्र सरकार को कहकर, रामचरितमानस से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर नीच, अधम कहने तथा महिलाओं, आदिवासियों, दलितों व पिछड़ों को प्रताड़ित, अपमानित करने वाली टिप्पणियों को हटवायें। मात्र बयान देकर लीपापोती करने से बात बनने वाली नही है।

मोदी दौर में शुरू हुई ‘कमंडल के साथ मंडल’ की रणनीति
दरअसल नब्बे के दशक में यूपी ने कमंडल और मंडल दोनों पॉलिटिक्स का उदय देखा। हिंदुत्व की पॉलिटिक्स करने वाली भाजपा को मंडल पॉलिटिक्स ने कई बार झटका दिया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का उदय ही मंडल पॉलिटिक्स की देन माना जाता है। 21वीं सदी में एक समय ऐसा आ गया, जब भाजपा यूपी की सियासत में हाशिए पर ही चली गई और सपा और बसपा मुख्य खिलाड़ी बन गईं। लेकिन नरेंद्र मोदी के पार्टी का चेहरा बनने के बाद भाजपा ने रणनीति में तेजी से बदलाव किया। यूपी प्रभारी बनाकर भेजे गए अमित शाह ने गैर यादव ओबीसी वर्ग और गैर जाटव दलित वर्ग को पार्टी से जोड़ना शुरू किया। यादव और जाटव सपा और बसपा के परंपरागत वोटर माने जाते हैं। पार्टी की ये रणनीति काम कर गई और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। इसके बाद 2017 में भी यही देखने को मिला। हिंदुत्व और जातीय गणित दोनों को साधते हुए भाजपा बड़े बहुमत से सपा को सत्ता से बाहर कर दिया। फिर 2019 में भी यही हुआ। सपा और बसपा एक साथ जरूर आईं लेकिन जातीय गोलबंदी में भाजपा इन दोनों पार्टियों से कहीं आगे निकल चुकी थी और मोदी चेहरे के साथ पार्टी ने आराम से दोनों दलों को पटखनी दे दी।’

2022 के चुनाव परिणाम ने बताया ब्राह्मण भाजपा से नाराज नहीं
फिर 2022 का विधानसभा चुनाव आया। इस चुनाव से पहले विरोधी दलों की तरफ से ब्राह्मणों की नाराजगी का मुद्दा उछाला गया। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मण विरोधी करार देने की कोशिश भी हुई। लेकिन इस बार फिर विपक्ष को झटका लगा। यूपी की जनता ने योगी की अगुवाई में पार्टी को दो तिहाई बहुमत परोस दिया। ब्राह्मणों की नाराजगी की बात हवा-हवाई साबित हुई और ये भी साफ हो गया कि विपक्ष की जातीय गोलबंदी में सेंध लग चुकी है, भाजपा हिंदुत्व के साथ ही ओबीसी और दलितों में भी अच्छी पैठ बना चुकी है।

जाहिर है चाहे वह केशव प्रसाद मौर्य हों या संघ प्रमुख मोहन भागवत, सभी के बयान बीजेपी की बैलेंस पॉलिटिक्स की तरफ ही इशारा कर रहे हैं। संघ प्रमुख सभी हिंदू एक हैं की अपनी बात पर टिके हैं, साथ ही जाति प्रथा का विरोध भी दर्ज करा रहे हैं। हां, पंडितों को लेकर उनके बयान पर विपक्ष कैसी राजनीति करेगा ये देखने वाला होगा क्योंकि यूपी में 2022 के विधानसभा चुनाव ने तो ये साबित कर ही दिया है कि ब्राह्मण बीजेपी से नाराज नहीं है।

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