कटारिया को अचानक क्यों भेजा गया राजभवन? राजस्थान BJP में बदलाव के संकेत

नई दिल्ली ,

राजस्थान बीजेपी के दिग्गज नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाब चंद कटारिया को असम का नया राज्यपाल बनाया गया है. नौ बार के विधायक और राजस्थान बीजेपी की सियासत में नंबर दो की पोजिशन रखने वाले गुलाब चंद कटारिया को विधानसभा चुनाव से ठीक छह महीने पहले राज्यपाल बनाकर भले ही राजनीतिक समीकरण साधने की कवायद की गई हो, लेकिन उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर कर भावी बदलाव के संकेत भी दे दिए हैं?

गुलाबचंद कटारिया को राजस्थान विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष पद से अचानक पूर्वोत्तर के असम का राज्यपाल पद पर भेज दिया गया है. वो भी ऐसे समय जब राजस्थान में विधानभा चुनाव को लेकर सियासी तपिश बढ़ गई है. माना जा रहा था कि विधानसभा चुनाव में बीजेपी के चेहरे के रूप में कटरिया चुनावी मैदान होंगे, लेकिन इससे पहले ही बीजेपी शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर करते हुए असम के राज्यपाल के रूप में नियुक्त कर दिया है.

कटारिया को हटाकर क्या दिया संदेश?
बीजेपी ने राजस्थान विधानसभा चुनाव में किसी भी नेता के चेहरे पर लड़ने से पहले इनकार कर दिया है, लेकिन गुलाबचंद कटारिया पार्टी के संभावित सीएम फेस में से एक थे. कटारिया की विदाई से बीजेपी ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं. एक तो चुनावी घमासान में कद्दावर नेताओं की सूची में से एक नाम हटने से पार्टी को प्रदेश की गुटबाजी को काबू करने में मदद मिलेगी तो दूसरी तरफ खाली हुई नेता प्रतिपक्ष की सीट पर असंतुष्ट गुट के विधायक का नाम आगे ​किया जा सकता है.

कटारिया पीढ़ी के नेताओं को संदेश
कटारिया ने भले ही पार्टी का फैसला मानते हुए राज्यपाल का पद स्वीकार कर लिया है. राज्यपाल बनाकर राजस्थान बीजेपी में जनरेशन शिफ्ट की शुरुआत कर दी गई है. इसे युवा पीढ़ी के नेताओं को आगे राजनीतिक रूप से बढ़ाने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है तो गुलाबचंद कटारिया की पीढ़ी के नेताओं को यह संदेश भी है कि अब सक्रिय राजनीति में जगह खाली करनी होगी. बीजेपी के इस फैसले से अब 70 की उम्र और उसके पार के विधायकों पर संकट मंडरा रहा है. बीजेपी में में ऐसे आठ विधायक हैं, जिनकी उम्र 70 साल से ऊपर है.

कटारिया सड़क से सदन तक सक्रिय रहे
राजस्थान बीजेपी में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की फेहरिस्त में गुलाब चंद कटारिया का एक नाम भी शामिल था. कटारिया पांच दशक से सियासत में सड़क से लेकर विधानसभा सदन तक सक्रिय रहे. साल 1977 से अभी तक 9 बार विधायक और एक बार सांसद रहे. राज्य के शिक्षा मंत्री, पीडब्ल्यूडी मंत्री, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री सहित दो बार राजस्थान के गृहमंत्री रहे हैं. कटारिया ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर दो बार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद रहे. ऐसे में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में से एक थे, लेकिन वसुंधरा राजे के चलते उनके सितारे बुलंद नहीं हो पा रहे थे.

​​​​​​कटारिया और वसुंधरा का अलग-अलग गुट
गुलाब कटारिया के राज्यपाल बनने के बाद अब आगे राजस्थान बीजेपी के अंदर चल रही राजनीतिक गुटबाजी में कई चीजें बदलेंगी. राजस्थान बीजेपी में बदलाव को एक खेमे के नेता के सियासी संन्यास के रूप में देखा जाएगा. उनके सक्रिय राजनीति से हटने के बाद उदयपुर से लेकर प्रदेश स्तर तक में स्पेस खाली हो गया. कटारिया और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सियासी अदावत जगजाहिर है और 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों के बीच जबरदस्त तकरार देखने को मिली थी.

मेवाड़ की सियासत में स्पेस खाली होगा
कटारिया मेवाड़ की राजनीति से राजस्थान और बीजेपी की सियासत के धुरी बने हुए थे. कटारिया मेवाड़ के ही कद्दावर नेता नंदलाल मीणा और रणधीर सिंह भिंडर के विरोधी हैं और ये दोनों वसुंधरा राजे के करीबी माने जाते हैं. कटारिया के गवर्नर बनने से मेवाड़ की सियासत में जगह जरूर खाली हो गई है. उस खाली स्पेस को भरने से नए समीकरण तो बनेंगे और नए नेताओं को भी मौका मिलेगा. उदयपुर सीट से कटारिया 2003 से लगातार विधायक चुनकर आ रहे थे. इससे पहले 1998 में भी जीते थे, लेकिन तब वह बड़ी सादड़ी सीट से विधानसभा चुनाव लड़े थे. ऐसे में उदयपुर सीट से नए चेहरे को टिकट मिल सकता है. ऐसे में वसुंधरा राजे के खेमे के नेता उदयपुर और मेवाड़ की राजनीति में अपना सियासी वर्चस्व जमा सकते हैं?

नेता प्रतिपक्ष से मिलेगा सीएम चेहरे का संकेत
राजस्थान बीजेपी कई गुट में बटी हुई है. पूर्व सीएम वसुंधरा राजे, गुलाब चंद कटारिया, प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया, वरिष्ठ नेता ओम माथुर, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, सांसद किरोड़ीलाल मीणा के अपने-अपने खेमे हैं. इन खेमों के अलावा भी कई नेताओं के अपने खेमे हैं. कटारिया के राज्यपाल बनने के बाद इन खेमों के नेताओं में उम्मीद जगी है. सक्रिय राजनीति से एक नेता के रिटायर होने के बाद कई के लिए अवसर बनते हैं. कटारिया सदन में नेता प्रतिपक्ष के पद पर थे और बजट सत्र चल रहा है. ऐसे में नेता प्रतिपक्ष से सीएम चेहरे का संकेत मिलेगा. नेता प्रतिपक्ष के चेहरे से पार्टी की खेमेबंदी के समीकरण भी बदलेंगे, क्योंकि पार्टी में 2023 के चुनाव में सीएम चेहरे को लेकर पहले से ही खेमेबंदी जारी है.

राजस्थान बीजेपी में दिग्गज नेता भले ही अपने-अपने खेमे बना रखे हों, लेकिन पार्टी की सियासत में अभी केंद्रीय हाईकमान बहुत मजबूत है. ऐसे में नए नेता प्रतिपक्ष से लेकर अगले विधानसभा चुनावों में चेहरे तक का फैसला पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से होना है. बीजेपी में पूर्व सीएम वसुंधरा राजे से लेकर सतीश पूनिया तक चुनाव में सीएम पद के चेहरे की दावेदारी करने वाले नेता लगातार सक्रिय हैं. गुलाबचंद कटारिया ने भी कहा है कि वसुंधरा राजे की भूमिका रहनी चाहिए, लेकिन क्या पार्टी अब उन्हें आगे बढ़ाएगी. इसके पीछे वजह यह है कि बीजेपी राजस्थान की सियासत को अपने इर्द-गिर्द रखना चाहती है.

पीएम मोदी की रैलियों का सियासी संदेश
वसुंधरा राजे नेता प्रतिपक्ष की रेस में हैं, लेकिन अभी पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता. चुनावी साल में जिसे भी यह पद दिया जाएगा, उसके जरिए सियासी मैसेज देने की कोशिश की जाएगी. वसुंधरा राजे से लेकर पार्टी के जितने नेता दावेदार हैं, उनको भी इसके जरिए संदेश दिया जाएगा. प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह से लेकर केंद्रीय नेताओं ने पहले भी साफ कहा था कि विधानसभा चुनावों में मुख्य चेहरा पीएम मोदी का ही होगा. इससे यह साफ है कि बीजेपी पहले सीएम का चेहरा घोषित नहीं करेगी. राजस्थान में जिस तरह से पीएम मोदी ने राजस्थान में रैलियां और कायर्क्रमों की शुरुआत की है. उससे साफ है कि स्थानीय नेताओं की जगह नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर ही चुनाव लड़ा जा सकता है.

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