इस्लामिक देश आपसी दुश्मनी भुला क्यों सऊदी अरब में जुटे?

नई दिल्ली,

मध्य-पूर्व की राजनीति में हाल के महीनों में ऐसे बदलाव हुए हैं जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. क्षेत्र के इस्लामिक देश अपनी दुश्मनी भुलाकर एक हो रहे हैं और इसका एक बड़ा उदाहरण है एक दशक से अधिक समय से अरब लीग से बाहर रहे सीरिया का अरब लीग शिखर सम्मेलन में शामिल होना.यह सम्मेलन सऊदी अरब की मेजबानी में शुक्रवार को जेद्दा शहर में हो रहा है जिसमें सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद भी हिस्सा ले रहे हैं. असद सीरिया में 2011 में शुरू हुए गृहयुद्ध के बाद पहली बार सऊदी अरब पहुंचे हैं.

22 अरब देशों के इस लीग में सऊदी अरब, यूएई, इराक, जॉर्डन, मोरक्को, सुडान, कुवैत, कतर, बहरीन, ओमान आदि देश शामिल हैं और लगभग सभी देशों के राष्ट्र प्रमुख अरब लीग शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं. इस सम्मेलन में हालांकि, संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल-नाहयान हिस्सा नहीं ले रहे हैं. उनकी जगह उनके भाई उपराष्ट्रपति शेख मंसूर बिन जायद सऊदी अरब पहुंचे हैं.हालांकि, इस बैठक को लेकर जिस बात की सबसे अधिक चर्चा है, वह है- सीरियाई राष्ट्रपति असद का इसमें हिस्सा लेना.

असद सरकार और सऊदी अरब की दुश्मनी
22 देशों के गुट अरब लीग में अरब स्प्रिंग के दौरान काफी उथल-पुथल का माहौल रहा था. दिसंबर 2010 में ट्यूनिशिया से शुरु हुए अरब स्प्रिंग के दौरान मध्य-पूर्व के कई देशों में भ्रष्ट और तानाशाही रवैये वाली सरकारों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए. कई देशों में सरकारें बदल गईं और सत्ता परिवर्तन को लेकर अरब देश आपस में भी भिड़ गए.

अरब स्प्रिंग के दौरान बशर अल-असद की सरकार पर आरोप लगे कि उन्होंने अपने खिलाफ हो रहे विरोध को बर्बरता से दबा दिया. इसे लेकर अरब देशों ने सीरिया की असद सरकार से अपने संबंध तोड़ लिए और अरब लीग में उसकी सदस्यता निलंबित कर दी गई. सऊदी अरब ने सीरिया की सरकार के खिलाफ लड़ रहे विद्रोही गुटों का समर्थन भी किया था. उसने विद्रोही गुटों को असद सरकार के खिलाफ लड़ने के लिए हथियार भी दिए थे.

गृहयुद्ध के कारण सीरिया की आम जनता को काफी नुकसान हुआ और आधी से अधिक आबादी को बेघर होने के लिए मजबूर होना पड़ा. युद्ध प्रभावित इलाकों में रह रहे 68 लाख लोगों को देश के अंदर ही विस्थापित होना पड़ा. असद की सरकार को हमेशा से रूस और ईरान का समर्थन मिलता रहा. साल 2018 तक सीरिया से अरब देशों का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया और रूस, ईरान ने वहां अपनी पकड़ मजबूत कर ली.

जब सऊदी सहित अरब देशों को यह लगने लगा कि बशर अल असद की सरकार को सत्ता से नहीं हटाया जा सकता और न ही वहां अपना प्रभाव बढ़ाया जा सकता है तब उन्होंने सीरिया के साथ अपने रिश्तों की बेहतरी के लिए काम करने शुरू कर दिए.

दोनों देशों के रिश्तों में एक बड़ा मोड़ तब आया जब इसी साल फरवरी की शुरुआत में आए विनाशकारी भूकंप ने युद्ध प्रभावित सीरिया को हिलाकर रख दिया. इसके बाद सऊदी अरब ने सीरिया के भूकंप प्रभावित लोगों की मदद के लिए भारी मात्रा में राहत सामग्री भेजी. पिछले हफ्ते ही दोनों देश अपने दूतावासों को खोलने पर सहमत हुए थे.

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान मध्य-पूर्व की स्थिरता के लिए अरब देशों के बीच शांति के हिमायती रहे हैं. इसी कारण उन्होंने अपने चिर प्रतिद्वंद्वी ईरान के साथ भी संबंधों को बहाल कर लिया है. दोनों देशों ने साल 2016 में अपने राजनयिक संबंध खत्म कर दिए थे. मार्च के महीने में चीन की मध्यस्थता में ईरान और सऊदी अरब ने एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किया था और अपने राजनयिक संबंधों को दोबारा बहाल करने पर सहमत हुए थे. अरब लीग के महत्वपूर्ण सदस्य सऊदी अरब का ईरान और सीरिया से संबंध बहाल करना क्षेत्र के लिए एक बड़ी घटना के तौर पर देखा जा रहा है.

क्षेत्र के दुश्मन देशों से रिश्ते सुधारने की जल्दबाजी में क्यों है सऊदी अरब?
सऊदी अरब के वास्तविक शासक क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सत्ता संभालने के बाद से ही देश का प्रभाव बढ़ाने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं. उनका मानना है कि देश की तेजी से बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए तेल से मिलने वाला राजस्व काफी नहीं है.

इसी कारण उन्होंने साल 2016 में अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ‘विजन 2030’ का अनावरण किया था. उनके इस प्रोजेक्ट का मकसद है, तेल पर सऊदी अरब की निर्भरता को कम करना. इस प्रोजेक्ट के तहत सऊदी अरब ने विदेशी निवेश और व्यापार बढ़ाने के लिए बड़े प्रयास किए हैं. इसके जरिए सऊदी अरब दूसरे देशों के साथ साझेदारी बढ़ाकर देश में व्यापार को बढ़ा रहा है.

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