बिहार में बदल रही कांग्रेस, जिलाध्यक्षों की सूची जारी होने के साथ ही सामने आया सच

पटना

बिहार में कांग्रेस अपनी छवि बदलने की तैयारी में जुट गई है। गुरुवार को बिहार के 28 जिलाध्यक्षों के नामों की सूची कांग्रेस ने जारी की। सूची देख कर साफ है कि कांग्रेस को सवर्णों पर सर्वाधिक भरोसा है। बिहार के 38 जिलों में 39 जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। फिलहाल सूची को देख कर यही लगता है कि आरजेडी-जेडीयू या दूसरे दलों की तरह कांग्रेस बिहार में मुस्लिम, ओबीसी और दलित वोटों के पचड़े में नहीं पड़ना चाहती। कांग्रेस की सूची से यह भी साफ है कि अपने स्वर्ण काल यानी श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिन्हा के दौर में यह लौट रही है। साल 1967 के पहले तक बिहार में कांग्रेस हावी थी और आबादी में अन्य जातियों के मुकाबले में कम होने के बावजूद श्रीकृष्ण सिंह से लेकर जगन्नाथ मिश्र तक सवर्ण ही बिहार के सीएम बनते रहे।

कांग्रेस में किस जाति के कितने जिलाध्यक्ष बने
कांग्रेस ने जिलाध्यक्षों की जो सूची जारी की है, उसमें 26 सवर्ण जाति के हैं। पांच ओबीसी, पांच अल्पसंख्यक और तीन दलित समुदाय के हैं। यानी 67 प्रतिशत जिलाध्यक्ष सवर्ण हैं। सवर्णों में भी सर्वाधिक 11 भूमिहार जाति से हैं। जिलाध्यक्षों में 28 नए चेहरे हैं तो 11 पुराने चेहरों को मौका दिया गया है। सूची तैयार करने में कांग्रेस के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह और प्रभारी भक्त चरण दास की भूमिका रही है। अखिलेश सिंह भूमिहार बिरादरी के हैं। इन दोनों ने सूची तैयार कर पार्टी आलाकमान को भेजा था। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल ने आलाकमान की मंजूरी के बाद सूची जारी की है।

बीजेपी के वोट बैंक पर कांग्रेस का सीधा निशाना
सवर्ण वोटरों के बारे में अब तक यही कहा जाता रहा है कि उन्हें पहले कांग्रेस पसंद थी। कांग्रेस के बिहार में कमजोर होते जाने और बाद में बीजेपी द्वारा नरेंद्र मोदी के पीएम फेस बनाने पर सवर्ण वोटरों ने कांग्रेस से किनारा कर लिया था। ज्यादातर सवर्ण वोटर बीजेपी के साथ अब भी हैं। कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से महागठबंधन की तरह ओबीसी, दलित और मुस्लिम जातियों के वोट के लिए मारामारी की बजाय अपना खोया जनाधार फिर से वापस लाने की तैयारी शुरू की है। विपक्षी एकता बन जाने के बाद महागठबंधन बाकी जातियों को साधेगा तो कांग्रेस सीधे सवर्णों को साधने का प्रयास करेगी। इसीलिए अपने सांगठनिक ढांचे में कांग्रेस ने 67 प्रतिशत सवर्णों को जगह दी है। हालांकि दूसरी जातियों के वोटों से भी उसे परहेज करना मुनासिब नहीं होगा। इसलिए हर जाति का प्रतिनिधित्व जिलाध्यक्षों की सूची में है।

श्री बाबू और अनुग्रह बाबू के दौर में लौटी कांग्रेस
1947 से 1967 तक बिहार कांग्रेस में सवर्णों का बोलबाला रहा। पिछड़ी जातियों और दलितों की अधिक आबादी रहने के बावजूद कांग्रेस का बिहार में वर्चस्व बरकरार रहा। 1947 के दौर में श्रीकृष्ण सिंह सीएम और अनुग्रह नारायण सिन्हा डेप्युटी सीएम थे। अनुग्रह बाबू के पास वित्त विभाग भी था। इस युगल जोड़ी की सरकार के बारे में एक बार जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि यह भूमिहारों की सरकार है। हालांकि सीएम श्रीकृष्ण सिंह राजपूत थे और डेप्युटी सीएम अनुग्रह बाबू भूमिहार। दोनों में तालमेल ऐसा था कि राजपूत और भूमिहार, दोनों उनकी सरकार को अपनी ही सरकार ही मानते थे। संभव है कि जेपी ने सरकार में भूमिहारों की बहुलता या दबदबा महसूस किया हो। हालांकि दोनों की अलग-अलग पहचान थी। अनुग्रह बाबू को लोग बिहार विभूति कहते हैं। बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में अनुग्रह बबू के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। ठीक वैसी ही स्थिति कांग्रेस की अभी दिख रही है। बिहार प्रदेश के अध्यक्ष अखिलेश सिंह भी भूमिहार हैं और उनके 39 में 11 जिलाध्यक्ष भी भूमिहार जाति से ही बनाए गए हैं। ब्राह्मण, कायस्थ और सवर्ण जाति के भी 15 लोगों को सूची में जगह मिली है।

बिहार में पहले भी होती रही है जातीय गोलबंदी
बिहार में जातीय गोलबंदी कोई नई परिघटना नहीं है। पहले भी होती रही है। तकरीबन 15 साल बिहार के सीएम राजपूत बिरादरी के श्रीकृष्ण सिंह रहे। भूमिहार बिरादरी से आने वाले उनके डेप्युटी सीएम अनुग्रह नारायण सिन्हा भी लगातार साथ रहे। दोनों के बीच तालेमल ऐसा था कि श्री बबू के शासन को लोग भूमिहार राज भी कहने लगे थे। फिर भी दोनों के बीच कभी इस बात का मलाल नहीं रहा। श्री बाबू पर कुछ लोग जातिवाद का आरोप लगाते हैं। इस आरोप का पहला जवाब तो यही है कि श्री बाबू ने अपने बेटे शिवशंकर सिंह को 1957 में चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। जाति और परिवारवाद की भावना होती तो श्री बाबू ऐसा नहीं करते। जब उनके साथियों ने दबाव डाला तो श्री बाबू ने सिर्फ इतना ही कहा था कि ठीक है, मैं चुनाव लड़ने की अनुमति तो देता हूं, लेकिन तब मैं खुद चुनाव नहीं लड़ूंगा। शायद यही वजह रही कि श्री बाबू और अनुग्रह बाबू की जाति अलग होने के बावजूद दोनों में खूब पटी।

पहली बार बिहार में ब्राह्मण सीएम बिनोदानंद झा
फरवरी 1961 में कांग्रेस विधायक दल के नेता का चुनाव होना था। कांग्रेस में दो गुट बन गए। भूमिहार विरोधी गुट का नेतृत्व बिनोदानंद झा कर रहे थे। बिनोदानंद झा ने भूमिहार जाति के महेश प्रसाद सिन्हा को हरा दिया। बिनोदानंद झा बिहार के नए मुख्यमंत्री बन गए। सूबे की सियासत में यह पहला मौका था, जब कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री बना। 1938 तक बिहार कांग्रेस वर्किंग कमिटी में एक भी ब्राह्मण सदस्य नहीं था। श्री कृष्ण सिंह के निधन के बाद बिहार कांग्रेस में गुटबाजी उफान मारने लगी। सवर्णों में ही सत्ता के लिए मारामारी होने लगी। 1961 में महेश प्रसाद सिन्हा इसलिए हारे कि ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ एकजुट हो गए। श्री कृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिन्हा के निधन के बाद भूमिहारों और राजपूतों में उस कद का कोई नेता ही नहीं उभरा। राजपूतों का एक वर्ग अनुग्रह नारायण सिन्हा के बेटे सत्येंद्र नारायण सिन्हा के नेतृत्व में आया भी तो बड़ा वर्ग बिनोदा

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