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इलाहाबाद हाई कोर्ट के रेप और रेप की कोशिश वाले फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान, कल होगी सुनवाई

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले का स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें हाई कोर्ट ने एक मामले में रेप और रेप की कोशिश के आरोप को नहीं माना था। हाई कोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के जो आरोप हैं उसमें कहा गया है कि लड़की का प्राइवेट पार्ट पकड़ा गया और उसके पायजामें का नाड़ा तोड़ा गया, हाई कोर्ट ने कहा कि ये आरोप अपने आप में रेप और रेप की कोशिश का केस नहीं बनता है।

इस फैसले के बारे में मीडिया में आई खबरों के बाद काफी विवाद हुआ था और अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए 26 मार्च को सुनवाई का फैसला किया है। जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ इस मामले की सुनवाई बुधवार को करेगी। कई कानूनी जानकारों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस टिप्पणी की आलोचना की, जिसमें यह परिभाषित किया गया कि बलात्कार के आरोप की प्रकृति क्या होनी चाहिए।

हाई कोर्ट ने कहा…यह मामला पोक्सो और आईपीसी की धारा-354 बी
हाईकोर्ट ने 17 मार्च को दिए अपने फैसले में कहा था कि जो केस का तथ्य है उसके तहत अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उसके मुताबिक लड़की का प्राइवेट पार्ट पकड़ा गया और लड़की के पायजामे के नाड़े को तोड़ा गया और उसे घसीटने की कोशिश की गई और इसी दौरान गवाह वहां पहुंच गए जिसके बाद आरोपी भाग गए। हाई कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में जो तथ्य है वह रेप या रेप की कोशिश नहीं है। बल्कि यह मामला आईपीसी की धारा-354 बी (महिला पर बल प्रयोग कर उसको निवस्त्र का प्रयाह करना) और पोक्सो की धारा-9 ((नाबालिग पीड़िता पर गंभीर यौन उत्पीड़न)) का मामला बनता है।

हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र की बेंच ने दो लोगों के रिविजिन पिटिशन पर सुनवाई के दौरान सुनाई। याचिकाकर्ताओं (आरोपियों) ने यूपी के कासगंज के स्पेशल जज द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। स्पेशल जज ने दो आरोपियों को रेप के मामले में दोनों को समन जारी किया था।

क्या है यह मामला?
पेश मामले के मुताबिक 10 नवंबर 2021 को शाम लगभग 5:00 बजे, शिकायतकर्ता अपनी 14 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ अपनी ननद के घर से लौट रही थी। रास्ते में गांव के ही आरोपी उससे मिले और पूछा कि वह कहां से आ रही है। जब उसने जवाब दिया कि वह अपनी ननद के घर से आ रही है, तो एक ने उसकी बेटी को बाइक पर बैठाने की पेशकश की और आश्वासन दिया कि वह उसे घर छोड़ देगा। आश्वासन पर भरोसा करके उसने अपनी बेटी को उनके साथ जाने दिया। लेकिन रास्ते में, आरोपी व्यक्तियों ने अपनी बाइक रोक दी और पीड़िता के प्राइवेट पार्ट पकड़ लिए।

एक आरोपी ने उसे घसीटने की कोशिश की और उसे पुलिया के नीचे ले जाने का प्रयास किया। उसने पीड़िता के पायजामे की डोरी खींच दी। पीड़िता की चीख-पुकार सुनकर दो लोग मौके पर पहुंचे। आरोपियों ने उन्हें देशी पिस्तौल दिखाकर धमकी दी और वहां से फरार हो गए। पीड़िता और गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद, अदालत ने आरोपियों को बलात्कार के आरोप में तलब किया।

हाई कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
लेकिन जब मामला हाई कोर्ट के सामने आया तो हाई कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में, आरोप यह है कि आरोपी ने पीड़िता के प्राइवेट पार्ट पकड़ लिए और वस्त्र उतारने की कोशिश की। इस प्रयास में उसने पीड़िता के पायजामे की डोरी तोड़ दी और उसे पुलिया के नीचे घसीटने की कोशिश की, लेकिन गवाहों के हस्तक्षेप के कारण वे भाग गए। हाई कोर्ट ने कहा कि यह तथ्य पर्याप्त नहीं है कि यह निष्कर्ष निकाला जाए कि आरोपियों ने पीड़िता से बलात्कार करने का पक्का इरादा बना लिया था। इसके अलावा, कोई अन्य कृत्य ऐसा नहीं था, जिससे यह साबित हो कि आरोपियों ने बलात्कार करने की मंशा से आगे कोई ठोस कदम उठाया। गवाहों ने यह नहीं कहा कि इस कृत्य के कारण पीड़िता निर्वस्त्र हो गई थी।

आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप और इस मामले के तथ्यों से यह स्पष्ट नहीं होता कि उनके खिलाफ बलात्कार की कोशिश का आरोप लगाया जा सकता है। किसी मामले में बलात्कार की कोशिश का आरोप लगाने के लिए अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होता है कि वह तैयारी के स्तर से आगे बढ़ चुका था।अदालत ने यह भी जोड़ा कि “तैयारी और वास्तविक प्रयास में मुख्य अंतर यह होता है कि अपराध करने की दृढ़ता कितनी प्रबल थी। हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में, प्रथम दृष्टया बलात्कार की कोशिश का आरोप नहीं बनता है।

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