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Friday, April 24, 2026
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‘अमेरिकन ड्रीम’ अब बना गया सपना, भारतीयों के लिए US में मुश्किल हुआ रहना, जानें क्या है वजह

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अमेरिका दुनियाभर से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसकी मुख्य वजह ‘अमेरिकन ड्रीम’ है, जो हर नागरिक को मेहनत और दृढ़ संकल्प के बूते सफल होने का मौका देता है। अमेरिकन ड्रीम की वजह से ही लाखों भारतीय अमेरिका में पहुंचे हैं और हर साल हजारों उसी नक्शेकदम पर चलते हुए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले मुल्क में पहुंच रहे हैं। हालांकि, अब धीरे-धीरे अमेरिकन ड्रीम का ख्वाब खत्म हो रहा है और लोगों के लिए ये बुरे सपने में बदल रहा है।

दरअसल, भारतीय प्रवासियों को अमेरिकन ड्रीम को पूरा करना जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। अमेरिका के जटिल इमिग्रेशन सिस्टम को समझना और फिर उससे बाहर निकलना पहाड़ चढ़ने जैसा काम है। भारतीयों के लिए परमानेंट रेजिडेंसी यानी ग्रीन कार्ड हासिल करना हो या फिर नागरिकता लेना, दोनों ही काम बेहद मुश्किल हैं। ग्रीन कार्ड और नागरिकता का रास्ता ना सिर्फ लंबा है, बल्कि भावनात्मक रूप से थकाने वाला है, जिससे व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर दबाव पड़ने लगता है।

H-1B वीजा हासिल करना बना सबसे बड़ी चुनौती
बहुत से लोगों के लिए सबसे मुश्किल काम H-1B वीजा हासिल करना है। स्किल भारतीय वर्कर्स इसी वीजा के जरिए अमेरिका जाते हैं, लेकिन इसे हासिल करना भी अपने आप में एक चुनौती है। इसकी मुख्य वजह ये है कि हर साल एक सीमित संख्या में H-1B वीजा जारी होते हैं। अमेरिका हर साल सिर्फ 65 हजार H-1B वीजा जारी करता है। H-1B वीजा पर लिमिट लगने की वजह से लॉटरी सिस्टम के जरिए इसे दिया जाता है। इस वजह से कई सारे योग्य आवेदकों को ये वीजा हासिल नहीं हो पाता है।

अमेरिका गए अजीत का मानना है कि H-1B वीजा उनके लिए नहीं है। वह अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम को टूटा हुआ बताते हैं। वह कहते हैं, “मैं इसे टूटा हुआ इमिग्रेशन सिस्टम कहूंगा। भारत इतना बड़ा देश है और हमें किसी अन्य छोटे देश की तरह 7 फीसदी का कोटा मिलता है। मुझे पता है कि H-1B सिस्टम एक लॉटरी सिस्टम है और ये मेरे लिए काम नहीं करेगा।” अब वह एक बिजनेस शुरू करने वाले हैं और खुद को इसके जरिए स्पांसर करेंगे।

डिपेंडेंट लोगों को भी झेलनी पड़ रही परेशानियां
मीता दमानी 20 साल पहले अमेरिका आई थीं। कई सालों तक वह देश में काम नहीं कर सकती थीं और डिपेंडेंट के तौर पर रह रही थीं। इस वजह से वह परेशान रहने लगीं और डिप्रेशन का शिकार हो गईं। वह कहती हैं, “मैं भयानक डिप्रेशन से गुजरी और फिर मैंने इस पर डॉक्यूमेंट्री बनाने का फैसला किया, ताकि लोगों को इस कहानी को बताया जा सके। सरकार ने उस समय H-4 वीजा पर डिपेंडेंट को काम करने की इजाजत नहीं दी थी और अभी भी ये बहुत अस्पष्ट है।”

दमानी ने बताया, “मुझे लगता है कि H-4 मुद्दे का स्थायी समाधान होना चाहिए, हमारे पास अभी जो है वह सिर्फ एक कार्यकारी आदेश है और कल कोई भी इसे बदल सकता है।” अमेरिका में H-1B वीजा होल्डर्स के पति/पत्नी और बच्चे भी चुनौतियों का सामना करते हैं। बहुत से डिपेंडेंट वीजा होल्डर्स को काम करने की इजाजत नहीं है, जिसकी वजह से वित्तीय तंगी के साथ प्रोफेशनल हानी भी होती है। डिपेंडेंट वीजा पाने वाले बच्चों को 21 साल की उम्र के बाद हायर एजुकेश हासिल करने या नौकरी खोजने में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

नागरिकता हासिल करना भी बेहद मुश्किल
राहेल पिछले 14 सालों से अमेरिका में रह रही हैं। नेचुरलाइजेशन में हो रही देरी की वजह से उनकी 17 साल की बेटी कुछ महीनों में ‘एजिंग आउट’ का सामना कर सकती है, जिससे नागरिकता मिलना मुश्किल हो जाएगा। राहेल ने कहा, “मैं यहां डिपेंडेंट H-4 वीजा पर हूं। मेरी बेटी इस साल 18 साल की हो रही है और वह अगले साल कॉलेज जाएगी। इस वजह से उसे बहुत से अवसर छोड़ने पड़ रहे हैं। वह एजिंग आउट का सामना कर रही है और 21 साल की होने तक हमारी नागरिकता की स्थिति नहीं बदलती है, तो उसे वापस भारत भेज दिए जाने का खतरा है।”

ग्रीन कार्ड के लिए लंबा इंतजार
भारतीय प्रवासियों के लिए परमानेंट रेजीडेंसी या ग्रीन कार्ड का रास्ता खासतौर पर काफी ज्यादा कठिन है। हर देश के लिए ग्रीन कार्ड को लेकर लगी लिमिट की वजह से भारतीय नागरिकों को रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए 50 साल या उससे ज्यादा समय तक इंतजार करना पड़ रहा है। सोनल शर्मा पिछले 10 सालों से न्यू जर्सी क्षेत्र में एक इमिग्रेशन वकील के रूप में काम कर रही हैं। वह कहती हैं कि उन्हें अपने मुवक्किलों के साथ ऐसी निराशाजनक स्थितियां देखने को मिलती हैं जो इमिग्रेशन पहेली में फंसे हुए हैं।

सोनल ने बताया, “ऐसी बहुत सारी कहानियां हैं, जिनका मैं सामना कर चुकी हूं। उनमें से एक जो मुझे याद है, वह यह है कि जब एक प्रमुख H-1B होल्डर की मौत हो गई और डिपेंडेंट (पति/पत्नी और बच्चों) को नहीं पता था कि उन्हें अब क्या करना है। उनके पास अचानक कोई देश ही नहीं था। यह एक दुखद स्थिति है।” उन्हें लगता है कि बैकलॉग और ग्रीन कार्ड के लिए लंबे इंतजार के कारण लोग बहुत सारे अवसर खो रहे हैं। अप्रवासियों के लिए इस प्रणाली को लेकर बहुत अनिश्चितता है।

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