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नहीं रहे पोप फ्रांसिस, वेटिकन सिटी में 88 साल की उम्र में निधन, लंबे समय से बीमार थे

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वेटिकन सिटी

रोमन कैथोलिक चर्च के वर्तमान प्रमुख और वेटिकन सिटी स्टेट के संप्रभु पोप फ्रांसिस का 88 साल की उम्र में निधन हो गया है। जन्म के वक्त उनका नाम जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो था और उनका जन्म 17 दिसंबर 1936 को अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में हुआ था। पोप बेनेडिक्ट XVI के इस्तीफे के बाद वे 13 मार्च 2013 को पोप बने थे। जिससे वे अमेरिका से पहले पोप, पहले जेसुइट पोप और 1200 सालों में पहली बार गैर-यूरोपीय पोप बने थे। ईस्टर संडे के बाद वो सार्वजनिक तौर पर नजर आए थे और उन्होंने इस दौरान सेंट पीटर्स स्क्वायर में 35,000 लोगों का अभिवादन किया था। डबल निमोनिया के गंभीर मामले से उबरने के बाद वो पहली बार सार्वजनिक समारोह में नजर आए थे। अपने 12 साल के पोप पद के दौरान उन्हें कई बीमारियों का सामना करना पड़ा और अब उन्होंने आखिरी सांस ले ली है।

फ्रांसिस का जन्म 17 दिसंबर 1936 को ब्यूनस आयर्स में जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो के रूप में हुआ था। उनके माता पिता मारियो और रेजिना सिवोरी थे, जो इटली में प्रवासी थे और रेलवे में एकाउंटेंट के रूप में काम करते थे। वो पांच भाई बहन थे। उन्होंने कैमेस्ट्री टेक्निशियन के तौर पर ग्रेजुएशन किया था और उसके बाद उन्होंने पादरी बनने का फैसला किया था। 11 मार्च 1958 को वह सोसाइटी ऑफ जीसस के नवप्रवर्तनक दल में शामिल हो गये।

पोप फ्रांसिस का 88 साल की उम्र में निधन
आपको बता दें कि किसी वर्तमान पोप की मृत्यु से रोमन कैथोलिक चर्च में शोक और नये पोप की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कई अनुष्ठानों के जरिए नए पोप का चयन किया जाता है और ये प्रक्रिया काफी सावधानीपूर्वक की जाती है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक जब कोई पोप मर जाता है या इस्तीफा दे देता है, तो चर्च एक अवधि में प्रवेश करता है जिसे “सेडे वैकेंट” (खाली सीट) के रूप में जाना जाता है। यह तब होता है जब सेंट पीटर का सिंहासन खाली होता है। यह अवधि आम तौर पर कई हफ्तों तक चलती है, जिसके दौरान दिवंगत पोप का शरीर सुरक्षित रखा जाता है और फिर उनका अंतिम संस्कार किया जाता है। इसके बाद कार्डिनल कॉन्क्लेव की तैयारी होती है, जो एक नया पोप चुनने के लिए निजी सभा होती है।

पोप बनने से पहले उन्होंने ब्यूनस आयर्स के आर्कबिशप के रूप में कार्य किया। वे इतालवी मूल के हैं लेकिन उन्होंने अपना ज्यादातर जीवन अर्जेंटीना में बिताया है।
उन्होंने सेंट फ्रांसिस ऑफ असीसी के सम्मान में "फ्रांसिस" नाम चुना, जो विनम्रता, गरीबी और शांति के प्रति अपने समर्पण के लिए जाने जाते हैं।
अपनी विनम्र जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने पोप के महल के बजाय गेस्टहाउस में रहने का फैसला किया।
उन्होंने सामाजिक न्याय, गरीबों की देखभाल, अंतर-धार्मिक संवाद और पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर जोर दिया।
करुणा, दया और ज्यादा समावेशी चर्च बनाने की उन्होंने वकालत की। खासकर हाशिए पर पड़े समुदायों के प्रति उन्होंने गहरा भाव दिखाया।

पोप फ्रांसिस से जुड़े कुछ विवाद
पोप फ्रांसिस को लेकर कई विवाद भी रहे। चर्च के कुछ रूढ़िवादी सदस्यों ने बहुत प्रगतिशील होने के लिए उनकी सख्त आलोचना की है। इसके अलावा उन्होंने चर्च के भीतर यौन शोषण के मामलों से निपटने के लिए कई सुधार किए। जिसके लिए उन्हें अंदरूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

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