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बांग्लादेश में इस्लाम राष्ट्रीय धर्म और संविधान में धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत… क्या हैं इसके मायने?

Published on

ढाका

बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को संविधान की प्रस्तावना से हटाने के प्रस्ताव पर बवाल मचा है। इसकी वजह संविधान सुधार आयोग की सिफारिश हैं। इस आयोग को शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद सत्ता संभालने वाले मोहम्मद यूनुस ने बनाया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को संविधान से हटाने का प्रस्ताव रखा है। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद बांग्लादेशी संविधान में निहित चार सिद्धांतों में से हैं। ऐसे में इस पर वामपंथी और समाजवादी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। वहीं इसने एक नए सवाल को भी जन्म दिया है। नया सवाल ये है कि जब बांग्लादेश का राष्ट्रीय धर्म इस्लाम है तो फिर संविधान में धर्मनिरपेक्षता का क्या मतलब रह जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता की बहस देश के गठन के समय यानी 1971 से ही चली आ रही है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े नेता और शेख हसीना के पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान ने एक धर्मनिरपेक्ष, उदार और लोकतांत्रिक बांग्लादेश की बात कही थी। हालांकि उस समय भी कुछ लोग पाकिस्तान से अलग देश बनाके खिलाफ थे। वे इसे मुस्लिमों में बंटवारे की तरह देखते थे। दूसरी ओर एक पक्ष सेक्युलर देश बनाने पर जोर दे रहा था। बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता की बहस पर जून 2024 में देश के प्रमुख अखबार डेली स्टार में नफीज अहमद का एक लेख छपा था।

बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता और संविधान
ढाका के नॉर्थ साउथ यूनिवर्सिटी में न्यायशास्त्र के प्रोफेसर नफीस अहमद ने अपने लेख में कहा था, ‘बांग्लादेशी संविधान की सबसे अनोखी विशेषताओं में से एक धर्मनिरपेक्षता (अनुच्छेद 12) को संरक्षित करने का वादा है। ये इसलिए खास हो जाता है क्योंकि संविधान इस्लाम को अपना राजकीय धर्म (अनुच्छेद 2A) भी घोषित करता है।’

नफीस आगे कहते हैं कि बांग्लादेश के मूल संविधान में धर्मनिरपेक्षता का वादा किया गया था। राष्ट्रीय धर्म बाद में एक संशोधन के जरिए जोड़ा गया। इसके बाद धर्मनिरपेक्षता को संविधान से हटाया भी गया। बाद में एक और संशोधन के माध्यम से इसे बहाल कर दिया गया। फिलहाल बांग्लादेशी संविधान में धर्मनिरपेक्षता और राजकीय धर्म दोनों हैं।

धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय धर्म विरोधाभासी?
प्रोफेसर नफीस अहमद कहते हैं, ‘अगर देखा जाए तो धर्मनिरपेक्षता का अस्तित्व और संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त राजकीय धर्म परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं क्योंकि दोनों के बीच एक आंतरिक संघर्ष है। इस सवाल पर बांग्लादेश की शीर्ष अदालत भी विचार कर चुकी है। साल 2016 में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राजकीय धर्म होने से धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का उल्लंघन नहीं होता है। अदालत ने कहा कि यह ना तो संविधान की मूल संरचना को प्रभावित करता है और न ही संवैधानिक रूप से गारंटीकृत धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।

नफीस का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता की एक नई समझ और इस्लाम को राजकीय धर्म के रूप में मान्यता देने के फैसले पर नए पहलू को जन्म दिया। ऐसे बांग्लादेश में संविधान से सेक्युलेरिज्म को हटाने का प्रस्ताव बांग्लादेश के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बांग्लादेश एक नया रास्ता चुनेगा। यह बांग्लादेशी पहचान की बुनियाद को फिर से परिभाषित कर सकती है।

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