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हमारे एटम बम इंडिया के लिए ही… भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध का खतरा कितना वास्तविक? क्या है सबसे बड़ा डर

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इस्लामाबाद

भारत और पाकिस्तान के बीच इस महीने 6 से 10 मई तक भीषण संघर्ष देखने को मिला। दोनों ओर से मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए। इस दौरान परमाणु युद्ध के खतरे की बात भी दुनियाभर में होने लगी क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। ये खतरा ना सिर्फ भारत और पाकिस्तान बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिहाज से नाजुक स्थिति को दिखाता है। दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों का इस्तेमाल दुनिया के बड़े हिस्से में तबाही ला सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध का खतरा कितना असली है।

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत-पाक में परमाणु हथियारों के खतरे को देखते हुए साल 2019 के एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने डरावनी स्थिति को पेश किया था। इस रिसर्च में कहा गया था कि 2025 (मौजूदा साल) में भारत की संसद पर आतंकी हमला हो सकता है। ये हमला भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध की वजह बन सकता है। इस साल एक बड़ा हमला भारत के पहलगाम में हुआ भी, जिसने भारत-पाकिस्तान को बड़े युद्ध की कगार पर ला दिया।

बैठक की घोषणा ने बढ़ाई चिंता
भारत से संघर्ष के दौरान पाकिस्तान में राष्ट्रीय कमान प्राधिकरण (एनसीए) की बैठक की बात सामने आई। एनसीए पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार को नियंत्रित करती है। हालांकि बाद में पाकिस्तान सरकार की ओर से ऐसी किसी बैठक से इनकार कर दिया गया लेकिन माना गया कि यह कदम रणनीतिक तौर पर दुनिया को परमाणु खतरे का संदेश देने के लिए उठाया गया।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के अनुसार, भारत के 180 और पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार हैं। ये हथियार दोनों देश ही नहीं दुनिया के बड़े हिस्से में तबाही मचा सकते हैं। सिपरी के मुताबिक, जनवरी 2024 तक दुनियाभर में 12,121 परमाणु हथियार थे। इनमें से 9,585 सैन्य भंडार में रखे गए थे, जिनमें 3,904 सक्रिय रूप से तैनात थे। ये साल 2023 की तुलना में 60 ज्यादा है।

भारत-पाक की परमाणु ताकत
सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ क्रिस्टोफर क्लेरी के अनुसार, भारत और पाकिस्तान दोनों के तैनात शस्त्रागार का बड़ा हिस्सा उनकी ग्राउंड मिसाइल हैं। भारत के पास पाकिस्तान की तुलना में बड़ा हवाई क्षेत्र (परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम विमान) हैं। भारत की नेवी भी पाकिस्तान के समुद्र-आधारित परमाणु बल की तुलना में उन्नत और अधिक सक्षम है। क्लेरी का कहना है कि इसका कारण यह है कि पाकिस्तान ने परमाणु पनडुब्बी बनाने में भारत से कम खर्च किया है।

भारत और पाकिस्तान की परमाणु नीति की बात की जाए तो 1998 में परमाणु हथियारों के परीक्षण के बाद से ही पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से आधिकारिक परमाणु सिद्धांत घोषित नहीं किया है। इसके विपरीत भारत ने 1998 में अपने परमाणु परीक्षणों के बाद इन हथियारों के पहले उपयोग ना करने की नीति अपनाई है। हालांकि भारत ने रासायनिक या जैविक हमलों के जवाब में परमाणु हथियारों का उपयोग करने का अधिकार सुरक्षित रखा है।

पाकिस्तान की परमाणु नीति
पाकिस्तान की परमाणु नीति में कुछ स्पष्टता 2001 में उस समय के NCA के रणनीतिक योजना प्रभाग के प्रमुख खालिद किदवई ने लाने की कोशिश की। खालिद ने कहा कि बड़े क्षेत्रीय नुकसान, प्रमुख सैन्य संपत्तियों का विनाश या आर्थिक नाकेबंदी में परमाणु का इस्तेमाल हो सकता है। इसके बाद 2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने स्पष्ट तौर पर कहा कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार भारत पर लक्षित हैं। इनका इस्तेमाल तभी किया जाएगा, जब देश के रूप में पाकिस्तान का अस्तित्व दांव पर लग जाएगा। पाकिस्तान का ये रुख कहीं ना कहीं खतरे को बढ़ा देता है।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के हूवर इंस्टीट्यूशन के सीनियर फेलो सुमित गांगुली का कहना है कि भारत हो या पाकिस्तान, कोई भी देश हिरोशिमा के बाद परमाणु निषेध का पहला उल्लंघनकर्ता कहलाना पसंद नहीं करेगा। गांगुली ने बीबीसी से कहा, ‘जो परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करेगा, उसे भारी जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा और उसे अस्वीकार्य क्षति उठानी पड़ेगी। ऐसे में ये आसान नहीं दिखता है लेकिन ये भी सच है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही अपने परमाणु शस्त्रागार को मजबूत करते दिख रहे हैं।

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