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डॉनल्ड ट्रंप ने कश्मीर पर फिर छेड़ा मध्यस्थता का राग, भारत ने हमेशा ही खारिज किया है

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नई दिल्ली:

शनिवार को भारत और पाकिस्तान के बीच बनी सहमत की सूचना सोशल मीडिया के जरिए देने के बाद, रविवार को भी अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक ऐसा पोस्ट साझा किया , जिसे लेकर भारत में काफी चर्चा हो रही है। अपने इस नए सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि वो ‘हजारों साल से चले आ रहे ‘कश्मीर’ के मामले के समाधान को लेकर दोनों देशों के साथ मिलकर काम करेंगे। लेकिन ट्रंप यहीं नहीं रुके। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात पर बहुत गर्व महसूस होता है कि अमेरिका, दोनों को इस ऐतिहासिक फैसले पर पर पहुंचने में मदद कर सका।

ट्रंप ने कहा कि मौजूदा आक्रामकता से लाखों लोगों की जान चली जाती । इसके साथ ही ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान को महान देश बताते हुए, कहा कि वो नई दिल्ली और इस्लामाबाद, दोनों के साथ व्यापार, सस्टेनेबिलिटी को बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। इसके साथ ही ट्रंप ने दोनों के राजनीतिक नेतृत्व की भी तारीफ की । इससे पहले शनिवार को ट्रंप ने ये कहा था कि अमेरिका की मध्यस्थता के बाद दोनों देश संघर्ष विराम पर सहमत हो गए हैं। ट्रंप के शनिवार की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी अपनी पोस्ट में कहा था कि कि दोनों देश अपने मुद्दों को लेकर एक न्यूट्रल साइट पर चर्चा करेंगे।

ट्रंप के पोस्ट में भारत और पाकिस्तान को लेकर एक जैसी भाषा
डिप्लोमेसी में भाषा का अहम महत्व होता है। ट्रंप ने अपनी इस पोस्ट में भारत और पाकिस्तान को कई स्तरों पर एक जैसा आंका है। भारत ‘हाइफनेशन’ के इस सिद्धांत को नहीं मानता। भारत दुनिया की एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है। जबकि पाकिस्तान आतंकवाद को स्पॉन्सर करने वाला देश है। खासतौर से सीमा पार आतंकवाद के मामले पर भारत पीड़ित रहा है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति की इस तरह की भाषा पर अचरज होना स्वाभाविक है।

कश्मीर पर मध्यस्थता का कोई सवाल नहीं
भारत ने हमेशा कहा है कि कश्मीर पर तीसरे पक्ष की भूमिका की कोई गुंजाइश नहीं है । पाकिस्तान की ओर से कश्मीर को लेकर अंतर्राष्ट्रीयकरण की कोशिशें की जाती रही हैं । जिसका भारत ने हमेशा पुरजोर विरोध किया है। ऐसे में ट्रंप की ओर से कश्मीर को लेकर मध्यस्थता को लेकर ऐसा बयान देना भारत के रुख के एकदम विपरीत है। हालांकि ये पहली बार नहीं है जब ट्रंप इस तरह की पेशकश कर रहे हैं। साल 2019 में भी व्हाइट हाउस में उस वक्त के पीएम इमरान खान से मुलाकात के दौरान कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थ बनने का ऑफर दिया था। हालांकि उस वक्त भी भारत ने उनके इस ऑफर को ठुकरा दिया था। वहीं इसी साल 26 अप्रैल को भी ट्रंप ने कश्मीर का जिक्र किया था, लेकिन उस वक्त उन्होंने कहा था कि दोनों देश ये मसला सुलझा लेंगे।

उन 48 घंटों में क्या हुआ ? कैसा रहा अमेरिका का रुख
भारत और पाकिस्तान के बीच सहमति की सूचना जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से दी गई वो चौंकाने वाली थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और मार्को रूबियो के बयानों से लगता है कि अमेरिकी नेतृत्व बीते 48 घंटों से भारत और पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के साथ संपर्क में था। रूबियो का कहना है कि वो और खुद जेडी वेंस ने भारत में पीएम मोदी और पाकिस्तान में शहबाज शरीफ के साथ संपर्क बना रखा था। इसके साथ ही पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के साथ वॉशिंगटन डीसी का प्रशासन बात कर रहा था। हालांकि एक दिन पहले ही वेंस ने फॉक्स न्यूज को कहा था कि भारत और पाकिस्तान संघर्ष मूलत: उनका बिजनेस नहीं है।

वेंस ने कहा था कि अमेरिका दोनों ही देशों को डि- एस्कलेट करने के लिए कह सकता है। लेकिन हम युद्ध के बीच में संलिप्त नहीं होना चाहते। वेंस ने ये भी कहा था कि इसे कंट्रोल करने का अमेरिका की क्षमता से कोई संबंध नहीं है। यानि रुबियो के शनिवार के बयान के मुताबिक जब वेंस ये बात कह रहे थे, उस वक्त वो और उनका विदेश प्रशासन दोनों देशों के उच्च नेतृत्व के साथ संपर्क में बना हुआ था। खास बात ये है कि ट्रंप के हालिया प्रशासन ने इस बात के संकेत कई बार दिए हैं कि प्रशासन अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों के बीच उलझना नहीं चाहता। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अपने प्रचार के दौरान भी ट्रंप ने ये बात कई बार कही थी और सत्ता में आने के बाद उनके इसी रुख की छाप उनकी विदेश नीति में भी दिखी।

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