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अडानी पर आरोप के बाद ट्रंप का टेस्‍ट, क्‍या भारत को अपने खेमे में रख पाएगा अमेरिका, कैसे रिश्‍तों पर आंच?

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नई दिल्‍ली

अमेरिकी अभियोजकों ने भारत के सबसे शक्तिशाली बिजनेसमैन गौतम अडानी पर 25 करोड़ डॉलर के रिश्वतखोरी के मामले में आरोप लगाए हैं। यह 2018 के हुवावे केस की याद दिलाता है। तब एक चीनी कार्यकारी की गिरफ्तारी ने चीन में तूफान खड़ा कर दिया था। गौतम अडानी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। यह मामला अमेरिका-भारत संबंधों को प्रभावित कर सकता है। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के सामने बड़ी दुविधा होगी। वह असमंजस में होंगे कि क्या उन्‍हें इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए? उनके मोदी से अच्छे संबंध हैं। उनकी टीम में चीन विरोधी लोग हैं जो भारत के साथ मजबूत संबंध चाहते हैं।

यह मामला अमेरिकी कानून की व्यापक पहुंच को भी दर्शाता है, जो दुनियाभर के दोस्तों और दुश्मनों दोनों को प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए यह मामला उसकी दोहरी रणनीति का ह‍िस्‍सा है। अमेरिका के साथ दोस्ताना रहना। साथ ही रूस और चीन जैसे देशों के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखना।

कैसे चीन के मामले से म‍िलता-जुलता है?
यह मामला 2018 में हुवावे टेक्नोलॉजीज कंपनी की एक कार्यकारी मेंग वानझोउ की गिरफ्तारी से काफी मिलता-जुलता है। मेंग हुवावे के संस्थापक की बेटी हैं। उन पर अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने का आरोप था। इस गिरफ्तारी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के करीबी लोगों को चौंका दिया था। इस पर सवाल उठे थे कि क्या तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मामले में हस्तक्षेप करेंगे। अब ट्रंप के सामने ऐसी ही दुविधा है। अडानी पर लगे आरोपों ने अमेरिका और भारत के बीच राजनयिक संबंधों में तनाव पैदा कर दिया है। हालांकि, मोदी की पार्टी ने इसे एक निजी मामला बताया है। वहीं, अडानी की कंपनी ने भी आरोपों का खंडन किया है।

तब ट्रंप ने क्‍या क‍िया था?
ट्रंप ने हुवावे मामले में हस्तक्षेप नहीं किया था। वह मामला आखिरकार 2021 में उनके पद छोड़ने के बाद सुलझ गया था। लेकिन, इस बार ट्रंप के पास इस मामले को रफा-दफा करने के ज्‍यादा कारण हो सकते हैं। मोदी के साथ ट्रंप के निजी संबंध हैं। इसके अलावा, आने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी टीम में चीन विरोधी लोगों को शामिल किया है। ये लोग इस क्षेत्र में चीन की ताकत को कम करने के लिए भारत के साथ मजबूत संबंध चाहते हैं।

ट्रंप अगर अडानी के लिए कोई एहसान करते हैं तो भी यह मामला अमेरिकी कानून की व्यापक पहुंच की याद दिलाता है। यह कानून दुनियाभर के दोस्तों और दुश्मनों दोनों को प्रभावित कर सकता है। अडानी ने अपनी चुनावी जीत के बाद ट्रंप की ‘अटूट दृढ़ता’ की प्रशंसा की थी।अमेरिका की ओर से रूस, चीन और यहां तक कि भारत पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते ब्रिक्स समूह का विस्तार तेजी से हुआ है। बेशक, भारत को ज्यादातर छूट मिली है, लेकिन ये देश वित्तीय प्रणाली पर अमेरिकी प्रभुत्व के विकल्प की तलाश में हैं।

भारत के पास खुले हैं व‍िकल्‍प
भारत के लिए अडानी के खिलाफ आरोप उसकी दोहरी रणनीति को मजबूत करते हैं। यह रणनीति है: अमेरिका के साथ दोस्ताना रहना। साथ ही रूस, चीन और ग्लोबल साउथ की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखना। भारत अभी भी रूसी हथियारों और ऊर्जा पर निर्भर है।

जानकारों के मुताबिक, अडानी के खिलाफ अभियोग को भारत में राजनीति से प्रेरित माना जा रहा है। जब तक आने वाला ट्रंप प्रशासन मुकदमा वापस नहीं ले लेता, तब तक इसका असर अमेरिका-भारत सहयोग और आपसी विश्वास पर पड़ेगा। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि अगला अमेरिकी प्रशासन भारत के साथ संबंधों को कैसे आगे बढ़ाना चाहता है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर फिलहाल कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। ट्रंप की टीम ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि मोदी अडानी से दूरी बनाएंगे या नहीं। उन्हें अब पहले से ज्‍यादा मुखर विपक्ष का सामना करना पड़ रहा है। विपक्ष ने इस साल की शुरुआत में हुए चुनावों के बाद संसद में अपना समर्थन काफी बढ़ा लिया है। वह अब जांच के लिए दबाव डाल रहा है। हुवावे के संस्थापक की बेटी मेंग वानझोउ की गिरफ्तारी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे चीन पर हमले के रूप में दर्शाया था। यह देखना होगा कि मोदी मामले में किस तरह का नजरिया अपना सकते हैं।

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