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रूस-यूक्रेन का युद्ध कब होगा खत्म? क्या भारत से निकलेगा शांति का रास्ता, जेलेंस्की की पीएम मोदी से बड़ी डिमांड

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कीव

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है। इस बीच यूक्रेनी राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने रूस के साथ युद्ध खत्म करने को लेकर एक नया प्लान बनाया है। मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक जेलेंस्की ने रूस के साथ युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से भारत में एक शिखर सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव रखा है। लोगों के मुताबिक पिछले सप्ताह उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने यह प्रस्ताव रखा था, जब वह यूक्रेन की यात्रा पर गए थे। जेलेंस्की का लक्ष्य नवंबर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले नेताओं की दूसरी बैठक आयोजित करना है।

इससे पहले जून में एक शिखर सम्मेलन हुआ था। रूस अब तक यूक्रेन की मीटिंग में शामिल नहीं हुआ है। रूस और भारत के बीच अच्छे संबंध हैं। ऐसे में यूक्रेन अगर भारत में मीटिंग कराने में कामयाब होता है तो यह जेलेंस्की के लिए बड़ी कामयाबी होगी। रिपोर्ट के मुताबिक पीएम मोदी ने अभी तक इसे लेकर सहमति नहीं दी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने एक सवाल के जवाब में कहा, ‘पीएम मोदी ने शांति प्रक्रिया में रचनात्मक भूमिका निभाने की अपनी इच्छा का संकेत दिया है।’

यूक्रेन चाहता है दुनिया का समर्थन
युद्ध खत्म करने से जुड़ी समिट की और भी सख्त जरूरत हो गई है, क्योंकि रूसी सेना यूक्रेन के पूर्वी डोनेट्स्क क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। यूक्रेन की सेना ने इस महीने रूस के कुर्स्क इलाके में अचानक से हमला कर दिया। रूस इस हमले से यूक्रेन हिल गया। जेलेंस्की के प्रवक्ता सेरही न्याकिफोरोव ने कहा कि यूक्रेन वैश्विक दक्षिण के किसी देश में शिखर सम्मेलन आयोजित करने पर विचार कर रहा है, जिसमें विशेष तौर से भारत शामिल है। जेलेंस्की अपने 10-सूत्री शांति ब्लूप्रिंट में दुनिया का समर्थन चाहता है। इसमें रूस की जमीन से सभी रूसी सैनिकों की वापसी की मांग की गई है।

जून में हुई थी मीटिंग
यूक्रेन ने इस प्रक्रिया में रूस को शामिल करने पर सहमति व्यक्त की है। हालांकि रूस बार-बार कहता रहा है कि उसका कीव के ब्लूप्रिंट को मानने का कोई इरादा नहीं है। स्विट्जरलैंड की ओर से आयोजित 15-16 जून के शिखर सम्मेलन में 100 से अधिक देशों और संगठनों ने भाग लिया था। लेकिन दुनिया से इसे पूरी तरह समर्थन नहीं मिल पाया। चीन इसमें शामिल ही नहीं हुआ। वहीं भारत ने इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका सहित प्रतिनिधिमंडलों के साथ मिलकर अंतिम विज्ञप्ति पर हस्ताक्षण से मना कर दिया।

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