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न्यूजक्लिक को चीन से पैसा आया या नहीं? दिल्ली हाई कोर्ट में कपिल सिब्बल की दलील जान लीजिए

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नई दिल्ली

न्यूजक्लिक मामले में सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने सोमवार को न्यूजक्लिक के संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ और एचआर हेड अमित चक्रवर्ती की यूएपीए प्रावधानों के तहत दर्ज मामले में उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। अदालत ने 6 अक्टूबर को याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा था, जिसके बाद एक हलफनामा दायर किया गया है।

जस्टिस तुषार राव गेडेला की उपस्थिति में पुरकायस्थ की ओर से पेश होते हुए, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने यह कहकर शुरुआत की कि आज तक भी, हमें गिरफ्तारी का कोई आधार नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि केवल गिरफ्तारी ज्ञापन ही वह दस्तावेज है जिसे प्रस्तुत किया गया है। दिल्ली पुलिस के उस जवाब पर, जिसमें कहा गया कि पुरकायस्थ को गिरफ्तारी का आधार दिया गया था, सिब्बल ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार कारणों से अलग हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले में सभी तथ्य झूठे हैं, चीन से एक पैसा भी नहीं आया है। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि आरोपी राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता से समझौता करना चाहते थे। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद जज ने फैसला सुरक्षित रख लिया। इससे पहले कोर्ट ने कहा कि वह बाद में निर्णय करेगा कि उसे नोटिस जारी करना चाहिए या नहीं। कोर्ट ने कहा कि वह यह भी फैसला करेगा कि आरोपियों की तरफ से उनके खिलाफ प्राथमिकी रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करनी चाहिए या नहीं।

हाई कोर्ट न्यूजक्लिक के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ और उसके एचआर हेड अमित चक्रवर्ती की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में उन्होंने गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत एक मामले में उनकी गिरफ्तारी, रिमांड और उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती दी थी। पुरकायस्थ और चक्रवर्ती को दोनों को पुलिस ने एक के बाद एक गिरफ्तार किया गया था। इससे पहले न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में लगाए गए आरोपों के मद्देनजर छापे मारे गए थे। लेख में कहा गया था कि न्यूजक्लिक को चीनी प्रचार को बढ़ावा देने के लिए भुगतान किया जा रहा था। दोनों व्यक्तियों को 4 अक्टूबर की सुबह के शुरुआती घंटों में सात दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया था। एफआईआर की प्रति नहीं मिलने पर उन्होंने इस मामले में दिल्ली की एक अदालत का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने 5 अक्टूबर को FIR की प्रति प्राप्त करने की उनकी याचिका को स्वीकार कर लिया था।

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