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‘MBBS डॉक्टर बनना है तो दोनों हाथ सलामत रखिए!’ क्या है ये नियम? जिस पर भड़क उठा सुप्रीम कोर्ट

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साल 2014 में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार बनने के बाद कई अहम फैसलों में से कुछ ने सबका ध्यान खींचा और कई फैसलों को क्रांतिकारी और बदलाव लाने वाले मोड़ के रूप में देखा गया। उन्हीं में से एक था – विकलांगता से पीड़ित लोगों के लिए ‘दिव्यांग’ शब्द का प्रयोग, जिसकी घोषणा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। उद्देश्य ये था कि शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के प्रति समाज को समावेशी बनाया जाए ताकि उनकी भागीदारी और भूमिका को बढ़ाया जा सके लेकिन अक्सर ऐसे मामले सामने आते रहते हैं जो बदलाव की उम्मीद की किरण पर सवाल खड़े करते हैं।

हालिया घटना सुप्रीम कोर्ट में दर्ज एक याचिका के रूप में सामने आई है। जहां सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के एक नियम पर सवाल खड़े कर दिए। NMC के इस नियम के अनुसार एक मेडिकल उम्मीदवार जो MBBS की पढ़ाई करके चिकित्सा क्षेत्र में करियर बनाना चाहता है, उसके दोनों हाथ सलामत होने चाहिए, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इसे भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताया है।

क्या है मामला?
दरअसल यह मामला अनमोल नाम के एक छात्र का है, जो NEET-UG 2024 परीक्षा के उम्मीदवार हैं। उन्हें दिव्यांगजन (PwD) श्रेणी में 2,462 रैंक मिली। लेकिन चंडीगढ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेज ने NMC के दिशानिर्देशों के कारण उन्हें प्रवेश देने से मना कर दिया। कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी। फिर सुप्रीम कोर्ट ने अनमोल की गुहार को जायज मानते हुए उस पर गौर किया। सुप्रीम कोर्ट ने AIIMS, नई दिल्ली को अनमोल की योग्यता का मूल्यांकन करने का निर्देश दिया।

एम्स के 6 सदस्यों की टीम में से 5 ने अनमोल को MBBS के लिए अयोग्य माना जबकि एक सदस्य डॉ. सत्येंद्र ने इस आधार पर उम्मीदवार को योग्य कहा कि उपकरणों और समायोजन की मदद से वह अपनी मेडिकल शिक्षा पूरी कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. सत्येंद्र की राय को स्वीकार किया और अनमोल को मेडिकल ऐडमिशन देने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेडिकल क्षेत्र में एंट्री करते समय ही अनमोल जैसे दिव्यांग लोगों को नहीं रोका जाना चाहिए।

जस्टिस बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की बेंच ने मामले को लेकर कहा कि ऐसी शर्तें दिव्यांगता के प्रति भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 41, दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD) के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे नियम ‘एबलिज्म’ (शारीरिक रूप से सक्षम लोगों को बढ़ावा देने की मानसिकता) को दिखाते हैं।

3 मार्च को अगली सुनवाई: इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट 3 मार्च की सुनवाई में इस बात पर गौर करेगा कि अदालत ने NMC (राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग) को नियमों में जो बदलाव सुझाए थे, उन्हें किया गया है या नहीं।

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