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‘अभी 14 दिन का काम और है…’, चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग पर बोले ISRO चीफ

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नई दिल्ली,

हमारे देश के वैज्ञानिकों ने वो कर दिया है जो दुनिया में अमेरिका, चीन जैसे तमाम बड़े बड़े देश कभी नहीं कर पाए. चंद्रयान ने जैसे ही चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंड किया, वैसे ही भारत इतिहास रचने वाला विश्व का पहला देश भारत बन गया. पूरे देश में इसको लेकर उत्साह है. दुनियाभर से बधाइयों का तांता लगा हुआ है. वहीं अब चंद्रयान चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव से चांद की तस्वीरें भेजने लगा है. इस बीच इसरो चीफ एस सोमनाथ ने कहा है कि अभी 14 दिन का काम और बचा है.

इसरो चीफ एस सोमनाथ ने कहा कि हमने असफलता (failure) से बहुत कुछ सीखा और उसे सुधारा. अभी 14 दिन का काम और है, हमें प्रयोग करने हैं. हमारे पास लैंडर पर तीन और रोवर पर दो उपकरण हैं, इसलिए उन सभी को चालू करने की आवश्यकता है. हमें सभी मेजरमेंट करने होंगे. हमें 14 दिन तक लग सकते हैं. हमें डेटा एकत्र करना है और इसी पर हमारा एकमात्र ध्यान केंद्रित है. यह बहुत सारे लोगों का योगदान है, जो वर्षों तक याद किया जाएगा. इसलिए हमें इसे इसरो के संपूर्ण वैज्ञानिक समुदाय को समर्पित करना चाहिए.

बता दें कि इसी साल जुलाई की 14 तारीख को दोपहर 2 बजकर 35 मिनट पर चंद्रयान-3 को लॉन्च किया गया था. ठीक 40 दिन बाद 23 अगस्त को शाम 6 बजकर 4 मिनट पर चंद्रयान-3 के लैंडर ने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की. लैंडर ने चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरकर इतिहास रच दिया है. चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंडर उतारने वाला भारत, दुनिया का पहला देश बन गया है. वहीं, चांद की सतह पर लैंडर उतारने वाला चौथा देश बन गया है.

कैसा है दक्षिणी ध्रुव का इलाका?
जैसा पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव है, वैसा ही चांद का भी है. पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका में है. पृथ्वी का सबसे ठंडा इलाका. ऐसा ही चांद का दक्षिणी ध्रुव है. सबसे ठंडा. चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अगर कोई अंतरिक्ष यात्री खड़ा होगा, तो उसे सूर्य क्षितिज की रेखा पर नजर आएगा. वो चांद की सतह से लगता हुआ और चमकता नजर आएगा. इस इलाके का ज्यादातर हिस्सा छाया में रहता है. क्योंकि सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं. इस कारण यहां तापमान कम होता है. ऐसा अंदाजा है कि हमेशा छाया में रहने और तापमान कम होने की वजह से यहां पानी और खनिज हो सकते हैं. इसकी पुष्टि पहले हुए मून मिशन में भी हो चुकी है.

चंद्रयान-3 का मकसद क्या?
चंद्रयान-3 का भी वही मकसद है, जो चंद्रयान-2 का था. यानी, चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग करना. और इसमें इसरो कामयाब रहा है. इसरो के इस तीसरे मून मिशन की लागत करीब 615 करोड़ रुपये बताई जा रही है. इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-3 के तीन मकसद हैं. पहला- लैंडर की चांद की सतह पर सुरक्षित और सॉफ्ट लैंडिंग करना. दूसरा- रोवर को चांद की सतह पर चलाकर दिखाना. और तीसरा- वैज्ञानिक परीक्षण करना.

पहला और सबसे कठिन पड़ाव पार हो चुका है. लैंडर के साथ तीन और रोवर के साथ दो पेलोड हैं. पेलोड को हम आसान भाषा में मशीन भी कह सकते हैं. रोवर भले ही लैंडर से बाहर आ जाएगा, लेकिन ये दोनों आपस में कनेक्ट होंगे. रोवर को जो भी जानकारी मिलेगी, वो लैंडर को भेजेगा और वो इसरो तक. लैंडर और रोवर के पेलोड चांद की सतह का अध्ययन करेंगे. ये चांद की सतह पर मौजूद पानी और खनिजों का पता लगाएंगे. सिर्फ यही नहीं, इनका काम ये भी पता करना है कि चांद पर भूकंप आते हैं या नहीं.

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