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देश में मतदान बढ़ाने के लिए अमेरिका से पैसा! बीजेपी का यूपीए पर वार तो पूर्व सीईसी ने किया पलटवार

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नई दिल्ली

देश में वोटिंग बढ़ाने के लिए अमेरिका से फंडिंग के मुद्दे पर विवाद पैदा हो गया। इस मामले में रविवार को बीजेपी ने कहा कि अमेरिकी वित्तपोषित कार्यक्रम यूपीए सरकार की तरफ से कथित तौर पर “देश के हितों के विरोधी ताकतों की तरफ से भारतीय संस्थानों में घुसपैठ’ को सक्षम करने का एक और उदाहरण था। हालांकि, देश में वोटिंग से जुड़ा यह प्रोग्राम अब रद्द किया जा चुका है। इस मामले में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एस वाई कुरैशी ने सफाई दी है। कुरैशी ने कहा कि वास्तव में 2012 में एक समझौता ज्ञापन हुआ था, लेकिन किसी भी तरह के फंड का उल्लेख ‘पूरी तरह से झूठ और दुर्भावनापूर्ण है।

अमेरिका ने रद्द किया प्रोग्राम
बीजेपी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से गठित एलन मस्क की अध्यक्षता वाले सरकारी दक्षता विभाग (DOGE) का सहारा लिया। विभाग ने घोषणा की कि उसने करदाताओं के करोड़ों डॉलर की लागत वाले कई कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है। इसमें ‘चुनाव और राजनीतिक प्रक्रिया सुदृढ़ीकरण के लिए संघ’ को 48.6 अरब डॉलर दिए गए। इसमें भारत में ‘वोटर टर्नआउट’ के लिए 2.1 करोड़ डॉलर शामिल थे।

बीजेपी ने यूपीए सरकार को घेरा
बीजेपी के आईटी विभाग के प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर कहा, ‘यह तेजी से स्पष्ट होता जा रहा है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए ने देश के हितों के विरोधी ताकतों को भारत के संस्थानों में घुसपैठ करने में व्यवस्थित रूप से सक्षम बनाया – जो हर अवसर पर भारत को कमजोर करने की कोशिश करते हैं।

30 जुलाई, 2010 से 10 जून, 2012 तक चुनाव आयोग के प्रमुख रहे कुरैशी ने एक्स से मामले को स्पष्ट करने के लिए कहा: “जब मैं 2012 में मुख्य चुनाव आयुक्त था, तब भारत में मतदाता मतदान बढ़ाने के लिए एक अमेरिकी एजेंसी की तरफ से कुछ मिलियन डॉलर के वित्तपोषण के लिए चुनाव आयोग की तरफ से किए गए समझौता ज्ञापन के बारे में मीडिया के एक वर्ग में आई रिपोर्ट में एक रत्ती भी तथ्य नहीं है।

MoU में फंडिंग की बात नहीं
एसवाई कुरैशी ने आगे कहा कि हां, 2012 में आईएफईएस (इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर इलेक्टोरल सिस्टम्स) के साथ एक एमओयू हुआ था, जैसा कि हमने कई अन्य एजेंसियों और चुनाव प्रबंधन निकायों के साथ किया था, ताकि इच्छुक देशों को ईसीआई के ट्रेनिंग और संसाधन केंद्र, आईआईआईडीईएम में प्रशिक्षण की सुविधा मिल सके, जो उस समय बहुत नया था।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि एमओयू में कोई फाइनेंसिंग या फाइनेंस का वादा भी शामिल नहीं था। उन्होंने कहा कि वास्तव में एमओयू में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि दोनों पक्षों पर किसी भी तरह का कोई वित्तीय और कानूनी दायित्व नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यह शर्त दो अलग-अलग जगहों पर रखी गई थी, ताकि किसी भी तरह की अस्पष्टता की गुंजाइश न रहे।

किस बात पर हुआ विवाद
इससे पहले, अमित मालवीय ने दावा किया था कि अरबपति अमेरिकी निवेशक जॉर्ज सोरोसकी छाया हमारी चुनावी प्रक्रिया पर मंडरा रही है। मालवीय ने सोरोस को कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार का सहयोगी बताया था। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने आईएफईएस के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस संगठन के बारे में उन्होंने दावा किया कि वह सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से जुड़ा हुआ है। इसे मुख्य रूप से यूएसएआईडी की तरफ से फंड दिया जाता है। मालवीय ने कहा कि मतदाताओं के वोटिंग के लिए 2.1 करोड़ डॉलर? यह निश्चित रूप से भारत की चुनावी प्रक्रिया में बाहरी हस्तक्षेप है। इससे किसे लाभ होता है? निश्चित रूप से सत्तारूढ़ पार्टी को नहीं।

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