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नेताजी के सिपाहियों को मिलने वाली थी फांसी, नेहरू के साथ इन दिमागदारों ने अंग्रेजों की हवा निकाल दी!

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नई दिल्‍ली

यह तस्‍वीर ऐतिहासिक है। इससे इतिहास का बड़ा अध्‍याय जुड़ा है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को तो आप पहचान गए होंगे। लेकिन, उनके साथ कौन हैं आप जरूर सोच रहे होंगे। आप यह भी जानना चाहते होंगे कि आखिर यह तस्‍वीर कब की है? नेहरू के साथ ये दोनों बैरिस्‍टर कहां पहुंचे हैं? इतिहास का इससे क्‍या कनेक्‍शन है? ‘तस्‍वीर की कहानी ‘ की छठी कड़ी में आज हम यहां आपको इन सभी सवालों के जवाब देंगे। सबसे पहले यह बता देते हैं कि यह तस्‍वीर 1945 की है। इसमें नेहरू के साथ कैलाश नाथ काटजू और तेज बहादुर सप्रू द‍िख रहे हैं। ये तीनों लाल किले जा रहे हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आईएनए के सिपाहियों की ढाल बनने।

बात आजादी से करीब दो साल पहले की है। 1945 में ब्रिटिश सेना ने सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद ह‍िंंद फौज (आईएनए) के सदस्‍यों को पकड़ा था। इनके खिलाफ पहला ट्रायल शुरू किया जाना था। इस ट्रायल को इतिहास में INA और रेड फोर्ट ट्रायल के नाम से भी जानते हैं। इस ट्रायल ने पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के भारत के संकल्प को मजबूत किया था। अंग्रेजी हुकूमत को मुकदमा चलाने के खिलाफ चेतावनी दी गई थी। लेकिन, तत्‍कालीन हुकूमत यह मानते हुए इस दिशा में आगे बढ़ी कि ज्‍यादातर भारतीय आईएनए के लोगों को गद्दार मान लेंगे।

सैन‍िकों में कौन-कौन थे शाम‍िल?
कठघरे में सबसे पहले आईएनए के तीन शीर्ष सैनिकों को लाया गया था। इनमें शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श ढिल्लों शामिल थे। उन पर संयुक्त रूप से राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया गया था। अंग्रेजों ने उन पर हत्या और हत्या के लिए उकसाने का आरोप भी मढ़ा था। यह और बात है कि अंग्रेजों का पूरा आकलन ही गलत साबित हुआ था। इस घटना ने पूरे देश में आईएनए के प्रति सहानुभूति पैदा की थी। जल्द ही पकड़े गए सैनिकों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन शुरू हो गए। कांग्रेस ने आईएनए के सैनिकों के लिए व्यापक समर्थन पर ध्यान दिया था। उसने महसूस किया था कि यह देश में आजादी के लिए उत्साह और भूख को फिर से जगाने का एक तरीका हो सकता है।

क्‍या दी गई थी बचाव में दलील?
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, पार्टी सहयोगी भूलाभाई देसाई और बैरिस्टर तेज बहादुर सप्रू आईएनए अफसरों की लीगल डिफेंस टीम में शामिल हुए थे। टीम ने यह तर्क देते हुए इन सैनिकों का जोरदार बचाव किया था कि इनकी कार्रवाई कानूनी थी। यह भारतीय राष्ट्रीय सेना अधिनियम की शर्तों के तहत थी। लिहाजा, उन्हें भारतीय दंड संहिता और भारतीय सेना अधिनियम से छूट दी जाए।

बचाव पक्ष की दलीलें बेहद दमदार थीं। तीनों आईएनए सैनिकों को युद्ध छेड़ने का दोषी जरूर पाया गया। हालांकि, उन्हें मौत की सजा नहीं दी गई। अलबत्‍ता, सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और जीवनभर के लिए जेल भेज दिया गया। बाद में आईएनए के तीन सदस्यों को रिहा कर दिया गया था। उनका नायकों की तरह स्वागत किया गया था। कांग्रेस ने जश्न में पूरा समर्थन दिखाया था।

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