नई दिल्ली
हाल ही में पूरी दुनिया ने देखा बांग्लादेश में छात्रों के एक विद्रोह ने 15 सालों से चल रही शेख हसीना की सरकार को कैसे एक झटके में हटा दिया। आलम यह था कि शेख हसीना ने अपनी जान बचाने के लिए बांग्लादेश से भागकर भारत में शरण ली। यह आंदोलन दुनिया के देशों को चौंकाने वाला रहा। एक दौर था जब भारत में भी छात्रों का एक बड़ा आंदोलन सरकार के लिए सिरदर्द बन गया था। लेकिन 1984 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने बहुत ही समझदारी और चुतराई से 6 साल पुराने छात्रों के आंदोलन को समाप्त कर दिया। आइए जानते हैं राजीव गांधी के पास ऐसा कौन सा हुनर था, जिससे शेख हसीना चूक गईं।
राजीव गांधी के चचेरे भाई अरुण नेहरू ने बताते हैं कि ‘रात के दो बजे राजीव गांधी ने मुझे फोन किया और बिना ज्यादा बात किए कहा, कॉफी पीने आ जाओ।’ 15 अगस्त, 1985 की रात को जब अरुण प्रधानमंत्री के घर पहुंचे तो राजीव ने उन्हें बताया, ‘हम असम समझौते पर दस्तखत करने वाले हैं, बस इतना ही।’ उस रात ऐतिहासिक 1985 असम समझौते पर दस्तखत हुए। इस समझौते ने असम में 6 साल तक चले छात्रों के आंदोलन का अंत किया। इस घटना ने इस इलाके को बहुत प्रभावित किया और आज भी इसकी राजनीति पर असर पड़ता है।
राजीव गांधी ने कैसे निपटाया छात्रों का आंदोलन?
साल 1985 था और राजीव गांधी ने 1984 में भारत के चुनाव इतिहास में सबसे बड़ी लोकसभा बहुमत हासिल किया था। यह 1983 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मिली समर्थन की लहर के साथ आया था। हालांकि, राजीव को हिंसा, आंदोलन, विरोध, विद्रोह और अलगाव की मांगों से जूझते हुए देश की विरासत मिली। पंजाब, असम और मिजोरम जैसे राज्य आग में थे। खासकर असम में बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों के घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन चल रहा था और छात्र संगठन सबसे आगे थे। 800 से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे और बंगालियों के चुनिंदा नरसंहार की खबरें सुर्खियां बन गई थीं। तभी राजीव गांधी ने, जो अभी-अभी पदभार संभाला था, चतुराई से इस हिंसक साल भर के आंदोलन को खत्म करने के लिए कदम उठाया। यह देश के सामने सबसे कठिन मुद्दों में से एक था।
दवाब के बावजूद राजीव गांधी ने हौसला बनाए रखा
15 अगस्त, 1985 की मध्यरात्रि के बाद असम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। प्रधानमंत्री ने ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और ऑल असम गण संग्राम परिषद (AAGSP) के छात्र नेताओं के साथ अंतिम समय में दबाव की रणनीति अपनाई थी। असम समझौता, केंद्र सरकार, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और ऑल असम गण संग्राम परिषद (AAGSP) के बीच एक समझौता ज्ञापन था, जिसका उद्देश्य असमिया लोगों की पहचान की रक्षा करना था। असम समझौते का राजनीतिक नतीजा सिर्फ 6 साल लंबे असम आंदोलन का खत्म होना नहीं था। इस समझौते से असम में एक नई सरकार का गठन हुआ, जिसमें आंदोलन के नेताओं ने एक राजनीतिक पार्टी बनाई और बाद के राज्य चुनाव जीते।
शेख हसीना के लिए बड़ा सबक
राजीव की ओर से सालों से चले छात्र विरोध को संभालना दिलचस्प है, क्योंकि हाल ही में बांग्लादेश में छात्रों द्वारा कोटा के खिलाफ हुए विरोध ने प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से बाहर कर दिया। छात्रों के आंदोलन ने हसीना के 15 साल के शासन का अंत कर दिया। 76 साल की शेख हसीना के विपरीत, तत्कालीन 40 वर्षीय राजीव गांधी ने विरोध प्रदर्शनों को समझदारी से संभाला और असम और पूर्वोत्तर में शांति लाने के लिए आंदोलनकारी छात्रों के साथ बैठे और समाधान खोजा।
