नई दिल्ली,
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र में मौजूद 13 राज्यों में पारिस्थितिकीय सर्वेक्षण कराने की प्रार्थना पर केंद्र सरकार से पूछा कि क्या एनजीटी के नियम के अनुसार पर्वतीय राज्यों के डेवलपमेंट में परिस्थितिकीय नियमों का पालन किया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने अगले सोमवार को सरकार से ड्राफ्ट रिपोर्ट मांगी है यानी केंद्र सरकार के जवाब के साथ अगले सोमवार को इस गंभीर मुद्दे पर सुनवाई आगे बढ़ेगी.
पहाडों पर अनियंत्रित और बेतहाशा हो रहे निर्माण पर सवाल उठाती इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश समेत सभी हिमालय पर्वतीय राज्यों में पहाड़ इसलिए दरक रहे हैं. बिना पारिस्थितिकीय सर्वेक्षण कराए अंधाधुंध निर्माण किए जा रहे हैं. इससे पहाड़ खोखले और पर्यावरण असंतुलन का शिकार हो रहे हैं. नतीजा सामने है कि पहाड़ दरक कर गिर रहे हैं.
सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने कहा कि इस अध्ययन के लिए कमेटी बनाई गई है. जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा और स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर ने ड्राफ्ट तैयार किया है तो कोर्ट ने कमेटी की रिपोर्ट तलब कर ली. केन्द्र सरकार की तरफ से एएसजी एश्वर्या भाटी ने कहा कि इस बाबत सरकार सभी मामलों पर ध्यान दे रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह जनहित याचिका पूर्व आईपीएस अधिकारी डॉक्टर अशोक कुमार राघव ने दायर की है. याचिका में आरोप है कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में मौजूद 13 राज्यों में आवासीय क्षेत्र ,वाहनों की मौजूदगी, पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता कितनी होनी चाहिए इसका ना तो अध्ययन किया गया है और न ही इन नाजुक पर्यावरण वाले राज्यों में पर्यटन जैसी गतिविधियों के नियंत्रण का कोई प्रयास हुआ है. वहीं, इन सबकी वजह से हिमालयी क्षेत्र में एक बड़े भूकंप का अंदेशा जताया गया है.
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वो इस बाबत एक कमेटी गठित करेगा जिसमें किनको शामिल किया जाए इसके सुझाव याचिकाकर्ता भी दें. कमेटी हिमालयी क्षेत्र में बड़े मशहूर और लोकप्रिय पर्यटक शहरों, कस्बों में पर्यावास की क्षमता और पर्यावरण का आकलन करेगी क्योंकि इन जगहों पर क्षमता से काफी अधिक लोग, वाहन और आधुनिक निर्माण का बोझ बढ़ता ही जा रहा है. अत्यधिक दबाव की वजह से वहां पर्यावरण असंतुलन और भू स्खलन की घटनाएं खतरनाक ढंग से बढ़ रही हैं.
