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हर चुनाव के साथ गुरमीत राम रहीम जैसों को पैरोल देने की स्‍थायी व्यवस्था हो

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नई दिल्ली,

गुरमीत राम रहीम को मंगलवार (28 जनवरी) को 12वीं बार पैरोल दी गई, जो दिल्ली विधानसभा चुनाव और हरियाणा नगर निगम चुनाव के साथ संयोग से मैच कर गया है. ऐसा लगता है कि हर चुनाव के साथ इस अपराधी के लिए जेल के दरवाजे खोल दिये जाते हैं. पता होना चाहिए कि गुरमीत गुरमीत राम रहीम को 2017 में अदालत से दो मामलों में 20-20 साल की सजा सुनाई जा चुकी है. लेकिन तब से अब तक 270 दिन यह पैरोल लेकर जेल से बाहर ही रहा. सवाल यह उठता है कि इस तरह के ‘अति विशिष्‍ट’ अपराधी को बार-बार पैरोल पर छोड़ने का झंझट ही क्यों हो? वैसे भी कोर्ट कचहरियों में मुकदमों की संख्या बहुत है. जेलों में कैदियों की भी संख्या भी कम नहीं है. देश की सर्वोत्तम अदालतें मान चुकी हैं कि नेता को चुनावों के दौरान जेल में नहीं रखा जा सकता. चुनाव लड़ रहे दिल्ली दंगों के आरोपी ताहिर हुसैन को प्रचार के लिए जेल से सशर्त आजादी दी गई है. इसके पहले कश्मीर में आतंकियों कों फंडिंग करने वाले राशिद इंजीनियर को चुनाव लड़ने और लड़वाने के लिए रिहा किया गया है. यानी, हर बार का सवाल एक ही कि ऐसे अपराधियों को छोड़ने के लिए बार-बार अदालत का समय जाया करने की जरूरत ही क्या है?

क्यों न देश में ऐसा कानून बना दिया जाए कि एक डाक्युमेंट जिससे यह साबित हो सके कि इस व्यक्ति को देश में चुनाव लड़ना या लड़वाना है उसे जेल से बाहर आने की छूट मिल सके. आखिर दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को हरियाणा चुनावों के लिए कोर्ट ने बाहर भेजकर यह मान लिया है राजनीति करने या कराने के लिए कि पैरोल पाना लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार है. अब देश में सबके पास इतना पैसा और बड़े वकील हायर करने की कूवत तो है नहीं. अगर देश में में पैरोल पर बाहर आने को आसान क्यों न कर दिया जाए. भारत में जेल से पैरोल पाना कोई अधिकार नहीं है, यह अधिकारियों के विवेक पर निर्भर करता है.

जाहिर है कि अधिकारियों का विवेक तभी जागृत होता है जब उन पर लक्ष्मी मेहरबान हों या सरकार उस कैदी पर मेहरबान हो. जाहिर है कि आम अपराधियों को न लक्ष्मी का सहारा मिलता है और न ही सरकार का. वे बेचारे इन भाग्यशाली कैदियों को देखकर मन मसोस कर रह जाते हैं. सरकार को चाहिए कि एक सिंपल कानून बना दिया जाए कि देश में एक सिंपल डॉक्युमेंट दिखाकर जेल से बाहर आने की छूट मिल जाए. हां इस डाक्युमेंट से यह जरूर साबित हो सके ये चुनावों में किसी न किसी रूप में सत्तारूढ़ पार्टी की मदद करेंगे. क्योंकि कोई भी सरकार बनेगी उसे अपने समर्थक कैदियों को मैनेज करने में बहुत टाइम खर्च करना पड़ता है. सरकार के पास जनहित के इतने ढेर सारे काम होते हैं कि उसे इस तरह के काम करने का मौका नहीं रहता है. इसलिए जनहित को ध्यान में रखते हुए सरकार को यह तत्काल फैसला लेना चाहिए कि गुरमीत राम रहीम जैसे लोगों को अपने राजनीतिक कामों के लिए जेल से बाहर आने जाने में रुकावट न आए. इस नए कानून के बन जाने से कम से कम आम कैदियों के लिए भी राहत जो जाएगी. उन्हें कॉम्प्लेक्स फील नहीं होगा कि राम रहीम, इंजीनियर राशिद, अरविंद केजरीवाल जैसे जेल में बंद लोगों को चुनाव के नाम पर बाहर आने की छूट मिल जाती है और हमें नहीं मिलती.

पैरोल के जरिए गुरमीत बाबा अब तक 2027 में जेल जाने के बाद से 275 दिन जेल से बाहर आ चुके हैं. दिल्ली और आस पास के राज्यों के चुनाव आते ही उन्हें रिहा कर दिया जाता है. बाबा के महत्व को इस तरह समझा जा सकता है कि पिछली बार 2 अक्टूबर को 20 दिनों के लिए हुई थी,उस समय हरियाणा में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव हो रहे थे. भाजपा उस समय दो कार्यकाल की सत्ता विरोधी लहर से जूझ रही थी. लेकिन बाबा के चलते तीसरी बार बीजेपी ने सरकार में वापसी कर ली. सिरसा स्थित उनके डेरा सच्चा सौदा के समर्थक हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में लाखों की संख्या में हैं. हरियाणा में, उनके डेरे की 24 सीटों पर वोटों को प्रभावित करने की क्षमता मानी जाती है. दिल्ली चुनावों में भी वो बहुत काम के साबित होने वाले हैं.

अब चूंकि माना जाता है कि गुरमीत राम रहीम जेल से बाहर आकर भाजपा के समर्थन में प्रचार करता है, तो विपक्ष को चाहिये कि वह वन नेशन वन इलेक्‍शन के प्रस्‍ताव पर सरकार का समर्थन दे दे. कम से कम इसी बहाने भाजपा सरकार को गुरमीत राम रहीम को बार बार रिहा कर उसके अनुयायियों को लुभाने का मौका नहीं मिलेगा.

 

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