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‘हिंदू कोड बिल आया तब कोई नहीं बोला, हिंदुओं को क्यों…’, मुस्लिम अधिकार कमजोर करने के आरोपों पर SC में बोले तुषार मेहता

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वक्फ संशोधन कानून, 2025 के विरोध में दाखिल याचिकाओं में कानून को संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन बताया गया है. अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी का अधिकार देता है. केंद्र ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर तगड़ा जवाब दिया है. केंद्र की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हिंदू कोड बिल लाया गया और हिंदुओं, ईसाइयों, सिखों और बौद्ध समुदाय के अधिकार छीने गए तब तो किसी ने नहीं कहा कि मुसलमानों को क्यों छोड़ा गया.

मुख्य न्यायाधीश भूषण रामाकृष्ण गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने तीन दिन की सुनवाई के बाद गुरुवार (22 मई, 2025) को फैसला सुरक्षित रख लिया. पहले दिन की सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलें दीं, जबकि 21 और 22 मई को केंद्र और अन्य राज्यों की ओर से पेश हुए वकीलों ने कानून के बचाव में अपना पक्ष रखा.

केंद्र की तरफ से एसजी तुषार मेहता ने कहा कि नया वक्फ कानून संविधान के अनुच्छेद 25 के विपरीत नहीं है. उन्होंने हिंदू कोड बिल का जिक्र किया, जो हिंदुओं के अधिकारों को संहिताबद्ध करने के लिए लाया गया था. उन्होंने कहा, ‘जब साल 1956 में हिंदू कोड बिल लाया गया तो हिंदुओं, ईसाइयों, सिखों, बौद्ध और जैन धर्म से उनके पर्सनल लॉ अधिकार छीन लिए गए. तब किसी ने ये नहीं कहा कि मुसलमानों को क्यों छोड़ा गया और अन्यों को नहीं?

हिंदू कोड बिल का मकसद हिंदू व्यक्तिगत कानूनों को एक सामान्य नागरिक संहिता में संहिताबद्ध और आधुनिक बनाना था. इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषयों पर महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, समान तलाक अधिकार और अन्य प्रावधान शामिल थे.

एसजी तुषार मेहता ने वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को शामिल किए जाने के मुद्दे पर तमिलनाडु एंडोमेंट एक्ट का उदाहरण दिया, जो नियमों के उल्लंघन पर मठाधिपति को हटाने की अनुमति देता है. उन्होंने कहा कि और हम यहां बहस कर रहे हैं कि गैर-मुस्लिमों को शामिल किए जाने से अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन होगा.

तुषार मेहता ने हिंदू बंदोबस्ती और वक्फ में अंतर बताते हुए कहा कि हिंदू बंदोबस्ती सिर्फ धार्मिक हैं वे धार्मिक काम ही करती हैं, लेकिन वक्फ में धर्मनिरपेक्ष संस्थाएं जैसे स्कूल, मदरसा, अनाथालय और धर्मशाला भी शामिल हैं. उन्होंने बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट का जिक्र करते हुए कहा कि यह महाराष्ट्र के मंदिरों का नियंत्रण करता है और इसमें व्यवस्था है कि चेयरमैन किसी भी धर्म से हो सकता है, जबकि वक्फ में ऐसा नहीं है.

एसजी तुषार मेहता ने बताया कि वक्फ में दो अधिकारी होते हैं, एक सज्जादानशीन होता है, जो आध्यात्मिक प्रमुख होते हैं और धर्म से जुड़े कामकाज देखते हैं. दूसरा होता है, मुतवल्ली, जो प्रशासक या प्रबंधक होता है. उन्होंने कहा कि वक्फ संशोधन कानून में सज्जादानशीन कोई विषय नहीं है, क्योंकि इस कानून का आध्यात्मिक या धार्मिक कामकाज से कोई लेना-देना नहीं है.

5 अप्रैल, 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिलने के बाद वक्फ संशोधन कानून देश में लागू हो गया था, लेकिन कई याचिकाकर्ता इस पर अंतरिम रोक की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. 16 अप्रैल को पहली सुनवाई में पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की बेंच ने 72 याचिकाओं पर सुनवाई की और अगली सुनवाई तक बोर्ड में नई नियुक्ति पर रोक लगा दी थी. साथ ही वक्फ घोषित संपत्ति पर भी यथास्थिति बनाए रखने को कहा था.

जस्टिस संजीव खन्ना ने अपने रिटायरमेंट से पहले ही नए सीजेआई बी आर गवई की बेंच को मामला ट्रांसफर कर दिया था. 20 मई से 22 मई तक तीन दिन सीजेआई गवई की बेंच ने वक्फ कानून मामले में सुनवाई की.

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